बनारस हिंदी की जन्मस्थली है। यहीं से हिंदी को व्याकरण भी मिला और शब्दानुशासन भी। कबीर, तुलसी से लेकर जगन्नाथ दास रत्नाकर और भारतेंदु हरिश्चंद्र से प्रेमचंद तक ने हिंदी को अनेक सांचे-खांचे की बोलियों के शब्द भंडार को आत्मसात कर समृद्ध बनाया।
भाषा निर्माण से लेकर हिंदी खड़ी बोली के विकास तक की धारा को बढ़ाने के लिए बनारस के अतुलनीय योगदान को हमेशा सिर -माथे रखा जाएगा।
हिंदी दिवस पर गुरुवार को जाने माने कथाकार प्रो काशीनाथ सिंह ने अमर उजाला से बातचीत में हिंदी के समृद्धशाली परंपरा के विकास पर रोशनी डाली।
उनका कहना है कि बनारस ने हिंदी को जो दिया वह न किसी ने दिया और अब न दे सकेगा। हिंदी की बोली ब्रज भी है, अवधी भी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में कबीर की तथाकथित सधुक्कड़ी भाषा भी हिंदी ही है।
वह कहते हैं कि भोजपुरी का प्रयोग कबीर के साहित्य में सबसे अधिक मिलता है। जबकि तुलसी ने अपना साहित्य अवधी में रचा है। बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र, जगन्नाथ दास रत्नाकर का साहित्य ब्रजभाषा में मिलता है।
भारतेंदु तो खड़ी बोली के निर्माता ही माने जाते हैं, जो आज बोली जाती है। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने उर्दू के शब्दों का हिंदी में प्रयोग करके हिंदी को हिंदुस्तानी बनाया। यानी आम हिंदुस्तानी का मतलब आम फहम की आम आदमी की जबान।