गंगा जमुना स्वीट मार्ट के रोहित उमरवैश्य बताते हैं कि इस मिठाई की खाशीयत है, जो एक एटम बम खा ले तो वह कितना भी भूखा रहे उसका पेट भर जाता है। अपने आकार और अलग स्वाद के कारण ही इसका नाम एटम बम पड़ा है। संगम स्वीट के सागर जायसवाल बताते हैं कि 250 रुपये प्रति किलो यह मिठाई चौराहे की हर दुकान पर उपलब्ध है।
इसे खाने लोग दूर से आते हैं और साथ ले भी जाते हैं। रोडवेज बसों से सफर करने वाले यात्री यहां बस रुकने पर एटम बम खाना नहीं भूलते।
ऐसे बनती है यह मिठाई
मधुर स्वीट मार्ट के संचालक प्रमोद कुमार मोदनवाल बताते हैं कि दूध को उबालकर उसका छेना तैयार करते हैं। कच्चे छेने में इलायची, किसमिस, काजू, चिरौंजी, मेवा का मिश्रण भरकर उसे चाशनी में पगाते हैं। एक एटम बम करीब 125-150 ग्राम का होता है। पहले इसका आकार 200 ग्राम तक होता था। महंगाई के साथ लागत बढ़ने के कारण आकार छोटा किया गया है।
ऐसे नाम पड़ा एटम बम
करीब 50 वर्ष से दुकान चला रहे पवन स्वीट मार्ट के संचालक सुरेश चंद्र का कहना है कि एटम बम का नाम इसके आकार और लजीज स्वाद के कारण है। परिवार के बुजुर्ग बताते थे कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एटम बम का नाम खूब चर्चा में आया था। एक एटम बम बड़े स्तर पर असर डालता था। इसी से प्रेरित होकर यह मिठाई बनाई गई कि इसे जो खा ले, वह दूसरा कुछ खाने की इच्छा न करे।
एटम बम में जहरीले पदार्थ भरे होते थे, मगर इसमें मेवा भरा गया। यह भी कहा जाता है कि एटम बम नाम देने का एक मकसद लोगों के बीच प्यार फैलाना भी था। लोग एटम बम से डरते थे, लेकिन सुजानगंज में लोग इसे खाकर यह कहते थे कि भारत के लोग एटम बम भी खा सकते हैं, लेकिन किसी से डरेंगे नहीं।
नाम सुनकर चौंक गई थीं इंदिरा गांधी
बुजुर्गों के अनुसार, राजनीतिक दौरे पर इंदिरा गांधी सुजानगंज क्षेत्र में आई थीं। तब उनके स्वागत में एटम बम मिठाई पेश की गई थी। नाम सुनकर वह चौंक गई थीं। उनकी टिप्पणी थी कि वाह यहां के लोग तो एटम बम भी खा जाते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इसका स्वाद ले चुके हैं।