जब जीतने से बड़ी चुनौती जीत को बड़ा करना हो। जब हर दूसरी बात में जाति-धर्म का जिक्र करनेवाले पूर्वांचल जैसे इलाके में चुनाव जाति-धर्म से परे हो जाए। वोटबैंक, क्षेत्रवाद, परिवारवाद का जिक्र तक न करे। और अपने रिकॉर्ड को तोड़ना ही अर्जुन सा लक्ष्य हो। तो ये पॉलिटिकल कहानी सचमुच काशी, बनारस, वाराणसी की ही होगी। देश में भाजपा की सबसे सुरक्षित सीट। जहां चुनौती, तनाव, कोशिश, कवायद सब का सब जीत का मार्जिन बढ़ाने की है। ये आज की पॉलिटिक्स और इस लोकसभा चुनाव में किसी सीट का एकतरफा हो जाने का सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट है।
वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य इमरजेंसी से अब तक बनारस की पत्रकारिता देख चुके हैं। कहते हैं भाजपा के पास संगठन है। कार्यकर्ता इनकी बड़ी ताकत है। बीजेपी छोड़कर किसी और के पास ये है ही नहीं। मोदी और अजय राय में धरती अंबर सा गैप है। लेकिन बात जब मार्जिन की आती है तो छोटी-छोटी चीजें बड़ी जरूरी हो जाती हैं। कबूतर उड़ाना अच्छा लगता है, लेकिन अंडा तो मत उड़ाइए। इस शहर को स्मार्ट मॉर्डन सिटी देखने लोग नहीं आते। ये 6000 साल पुराना दुनिया का सबसे प्राचीन शहर है।
यहां राजनीति चाय की अड़ी पर खौलती है, कचौड़ी की दुकान पर उनमें सत्तर मसाले मिलाए जाते हैं। और फिर बेलोस सी महफिल उठती है तो अति संकरी गलियों में अगली सुबह तक के लिए अंतर्ध्यान हो जाती है। काशी की पॉलिटिक्स और आंखन देखी को अगर राजनीति की बारहखड़ी में समझना चाहते हैं तो सबसे पहले जानना होगा कि इस बार चुनाव में क्या अलग है।
पहला - कम प्रत्याशी
पिछली बार 27 प्रत्याशी थे और उससे पहले 2014 में 43 उम्मीदवार। इस बार सिर्फ 8। इसका सीधा फायदा वोट के बंटवारे में होगा। जो वोट पहले टुकड़े टुकड़े हो जाते थे वो इस बार थोक भाव में एक किसी पार्टी के हिस्से हो जाएंगे।
दूसरा - सपा और कांग्रेस साथ
इन दो पार्टियों के साथ होने से मुस्लिम वोट बंटेंगे नहीं। सपा को पिछली बार 1.95 लाख (18.4 प्रतिशत) वोट मिले थे और कांग्रेस को 1.52 लाख (14.48 प्रतिशत)। अगर इतने भी वोट मिल जाते हैं तो 3.5 लाख करीब वोट विपक्ष के हिस्से आएंगे। पीएम मोदी को 6.74 लाख वोट मिले थे जो कुल वोट का 63.6 प्रतिशत था।
तीसरा - बसपा सबसे कमजोर है
मुस्लिम कैंडिडेट उतारने के बावजूद बसपा के हिस्से उनके वोट नहीं आएंगे। काशी बसपा की प्रायोरिटी लिस्ट में नहीं है। पहले काशी में दो बार प्रत्याशी बदला फिर स्टार प्रचारकों को यहां से दूर रखा गया। वोटर इसे लेकर कंफ्यूज हैं। पिछली बार बसपा-सपा साथ थे।
चौथा - एक से ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार
हर बार एक से ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार काशी से खड़े होते रहे हैं। इस वजह से इनके वोट बंट जाते थे। 2019 और 2014 में चार-चार मुस्लिम कैंडिडेट खड़े हुए थे। इस बार इकलौते लारी बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार हैं।
पांचवी - पहली बार विश्वनाथ कॉरिडोर और राम मंदिर
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकापर्ण के बाद ये पहला चुनाव है। वहीं राममंदिर का पॉलिटिकल फायदा अयोध्या से थोड़ा ही कम काशी के हिस्से आएगा। धर्म के इस एंगल का ठीक ठीक असर इस सीट पर होगा।
छठी - नारी वंदन
पहली बार काशी में महिलाओं के लिए सम्मेलन हुआ। वो इतना बड़ा था जितना किसी पार्टी ने कहीं नहीं किया। इसका संचालन, प्रबंधन सब का सब महिलाओं के हाथ था। आधी आबादी को साधने का ये ब्रह्मास्त्र माना जा रहा है।
सातवां - लार्जर देन लाइफ
पहली बार भाजपा ने नामांकन में इतनी बड़ी फौज जुटाई। गठबंधन का जोर दिया। 16 राष्ट्रीय अध्यक्ष, तीन सीएम, रक्षा-मंत्री समेत 4 केंद्रीय मंत्री मौजूद रहे। इसके बाद प्रचार के लिए आखिरी हफ्ते में काशी को पॉलिटिकल टूरिज्म का डेस्टिनेशन बना दिया। भरपल्ले मिनिस्टर गलियों में चाय पीते, योगा करते, धर्म बटोरते दिखे। कमजोर विपक्ष भी नहीं था। डिम्पल-प्रियंका-राहुल-अखिलेश चारों को काशी यात्रा करवा दी।
वाराणसी में दो विधानसभा देहात की हैं तीन शहरी। देहात वाले में पटेल भूमिहार ज्यादा हैं। शहर में कायस्थ, ब्राह्मण, मुस्लिम, वैश्य। इसके अलावा यादव भी हैं। 20 प्रतिशत मुस्लमान वोटर हैं।
किस विधानसभा में कौन सी जाति के वोटर ज्यादा…
- सेवापुरी में भूमिहार-पटेल
- रोहनिया में पटेल
- कैंट में कायस्थ और मुस्लिम
- उत्तरी में वैश्य जायसवाल
- दक्षिणी में ब्राह्मण और मुस्लिम
काशी में राजनीति के 2 काल
क्रांतिकारी
बनारस में राजनीति के तीन काल हैं। एक देशकाल, दूसरा जाति काल और तीसरा पहला क्रांतिकारी आंदोलन का। जब काशी के घाट और उसके किनारे बने मंदिरों में गुप्त बैठकें होती थीं। यहीं से निकले डॉ संपूर्णानंद, टीएन सिंह, रघुनाथ सिंह राष्ट्रीय नेता हुए। इमरजेंसी की पौध राजनारायण ने इंदिरा गांधी को हरा कर इतिहास अपने हिस्से कर लिया। काकोरी मामले में बीएचयू के एक स्टूडेंट को फांसी तक हो चुकी है।
धर्म
दूसरा काल वो था जब धर्म के आधार पर राजनीति दौड़ने और फुदकने लगी। इसमें भाजपा ने शिरीषचंद्र दीक्षित को सांसद चुनाव लड़वाया। वो कारसेवकों को अयोध्या पहुंचाने की योजना बनानेवाले अशोक सिंघल के करीबी थे। कारसेवकों पर गोली चली तो खुद सामने आ गए थे, पूर्व डीजीपी को देखा तो पुलिस ने गोली चलाना बंद कर दी थी। ये इंदिरा गांधी के सिक्योरिटी अफसर भी। ये वक्त था 1991 का। अयोध्या में बाबरी के तुरंत बाद ये काशी आ गए। इसके बाद भाजपा का ही कब्जा रहा। 1996 से 1999 तीन बार चुनाव हुए और तीनों बाद शंकर प्रसाद जायसवाल जीते। 2004 में एक बार ये सीट कांग्रेस के हिस्से चली गई। फिर एक बार हिंदूवादी इमैज वाले नेता मुरली मनोहर जोशी को उतारा। विपक्ष में मुख्तार अंसारी थे। जब सारा पूर्वांचल जाति के आधार पर प्रत्याशी और वोट चुनता बीनता रहा तब भी काशी में धर्म की ही राजनीति हुई।
पीएम मोदी के अलावा जो सात लोग इस चुनाव मैदान में हैं उनमें सबसे बड़ा नाम है अजय राय का। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और पांच बार के विधायक हैं। उनके बाद नाम आता है बसपा के अथर जमाल लारी का। बुनकरों के नेता हैं, कई चुनाव लड़ चुके हैं। फिर अपना दल कमेरावादी के गगन प्रकाश यादव का नाम आता है। वो पीडीएम के प्रत्याशी हैं और उनकी पार्टी पटेलों में दबदबा रखती है। युग तुलसी पार्टी के कोली शेट्टी दक्षिण भारत से हैं। काशी में दक्षिण भारतीयों की ठीक ठीक आबादी है। दो निर्दलीय प्रत्याशी संजय कुमार तिवारी और दिनेश यादव हैं। तिवारी सीए हैं और सोशल वर्कर हैं। यादव तीन बार के पार्षद। एक तरफ कमल है और दूसरी तरफ मुकाबले में हाथ, हाथी, लिफाफा, रोड रोलर, बांसुरी और डंबल है।