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राष्ट्रीय स्मारक पर उग आईं घास और झाड़ियां

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काशीवासियों की बहादुरी और वीरता का प्रमाण समेटे ग्रेव्स ऑफ यूरोपियन आफिसर्स का नामोनिशान अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। हालत यह है कि स्थानीय लोगों को भी इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित यह धरोहर अब धीरे-धीरे गायब हो रही है।
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शिवाला घाट स्थित ब्रिटिश अधिकारियों की कब्र काशी के गौरव और काशीवासियों के शौर्य को बखान करती है, लेकिन पुरातत्व विभाग की लापरवाही के कारण किसी को इसकी जानकारी तक नहीं है। ग्रेव्स ऑफ यूरोपियन आफिसर्स को खोजते-खोजते जब अमर उजाला की टीम मौके पर पहुंची तो वहां पर गंदगी, अतिक्रमण और कब्रों पर घास और झाड़ियां उग आई हैं। तीन में से दो कब्रों का अस्तित्व भी अब समाप्त हो चुका है। चारों तरफ ऊंचे मकानाें के बीच राष्ट्रीय स्मारक अब खत्म हो रहा है। ना तो कोई इसको जानता है और न ही लोगों को इसके बारे में पता है।
वहीं बगल में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का बोर्ड लगा हुआ है जो अब धीरे-धीरे खराब हो चुका है। बोर्ड पर बकायदा लिखा हुआ है कि यह स्मारक प्राचीन संस्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम के तहत राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया गया है। यदि कोई भी इस स्मारक को क्षति पहुंचाता है तो उसे एक लाख रुपये का जुर्माना और दंड दिया जा सकता है। वहीं बोर्ड पर उल्लेख किया गया है कि स्मारक की सौ मीटर की परिधि में निषिद्ध क्षेत्र घोषित है वहां पर निर्माण और खनन की अनुमति नहीं है वहीं दो सौ मीटर तक के क्षेत्र में ना तो कोई निर्माण हो सकता है और ना ही भवन निर्माण, पुनर्निर्माण और मरम्मत का काम। बावजूद इसके राष्ट्रीय स्मारक के चारों तरफ ऊंची इमारतें तन गई हैं और आसपास गंदगी की भी भरमार है। स्थानीय निवासी दिग्विजय सिंह ने बताया कि साल भर में कभी-कभी कोई विभाग की ओर से भूले भटके आ जाता है। यहां पर एक नियमित कर्मचारी की नियुक्ति भी थी लेकिन लंबे समय से उसका पता नहीं है। बचपन मे हमलोगों ने देखा था कि यहां पर तीन कब्र हुआ करती थी लेकिन जैसे जैसे बड़े होते चले गए, वैसे-वैसे कब्रें खत्म होती चली गईं। अब मात्र एक ही कब्र बची हुई है। उस पर घास और झाड़ियां उग आई हैं।
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विद्रोह के दौरान मारे गए थे तीन अंग्रेज अधिकारी व दो सौ सैनिक
कब्रिस्तान के पास लगा शिलापट्ट उस दौर में हुई लड़ाई की गवाही देता है। इस पर स्पष्ट अंकित है कि इस जगह पर ड्यूटी करते हुए तीन अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट स्टाकर, लेफ्टिनेंट स्टाक और लेफिटनेंट जार्ज समेत करीब 200 अंग्रेजी सैनिक मारे गए थे।
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काशीवासियों की बहादुरी का प्रमाण है अंग्रेजों की कब्र
मिलिंद श्रीवास्तव और नागेश पांडेय ने बताया कि पुरातत्व विभाग की वेबसाइट पर सौवें नंबर पर शिवाला पर ग्रेव्स आफ यूरोपियन आफिसर्स को ऐतिहासिक बताया गया है। यह कब्र काशीवासियों की बहादुरी का प्रमाण है। पूरा शिवाला क्षेत्र ही ऐतिहासिक है। यहीं पर अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहला विद्रोह आज से लगभग दो सौ चालीस साल पहले हुआ था। इसमें कई अधिकारी और अंग्रेजी सैनिक मारे गए थे। शिवाला क्षेत्र मे दफन अंग्रेजों की कब्र उस ऐतिहासिक विद्रोह कि कहानी स्वयं कहती है।
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