रस के भरे तोरे नैन... पर लालित्य भरे सुरों के आलाप हों या घिर घिर आई बदरिया कारी/पिया बिनु लागे नाहीं मेरा जिया... की मिठास या फिर बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए... जैसी बोल-बनाव की ठुमरी की अमर बंदिश। ठुमरी गायकी में पद्मविभूषण गिरिजा देवी की आवाज और अंदाज का कोई जोड़ नहीं था।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में चारों पट की गायकी में महारत हासिल करने वाली वह देश की इकलौती सुर साधिका थीं, जिन्होंने 50-60 के दशक तक रईसों के मनोरंजन तक सिमटी शृंगार प्रधान ठुमरी पर आध्यात्मिकता का रंग चढ़ाकर उसे संगीत के विश्व पटल पर प्रतिष्ठापित कर दिया।
यह कहते हुए बनारस घराने के विख्यात खयाल गायक पदमभूषण पं. राजन मिश्र संजीदा हो जाते हैं। संगीत साधना में अप्पा जी की शख्सियत की तुलना वह कुतुबमीनार से करते हैं।
वह बताते हैं कि संगीत साधना की वह वो ऊंची चोटी थीं, जहां तक नजर दौड़ाने के लिए सिर उठाने पर किसी के भी सिर की टोपी गिर जाएगी। वह जितनी बेहतरीन कलकार थीं, उतनी की गर्वीली प्रेममयी ममता की छांव भी। संगीत जगत में उनका कोई नाम नहीं लेता था, सिर्फ प्यार और अदब से लोग अप्पा जी कहकर पुकारते थे।