वाराणसी से रामनगर को जोड़ने वाले पुल के पायों के आसपास अप्रत्याशित रूप से बन रहे रेत के टीलों ने नदी विज्ञानियों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों की मानें तो पुल की गलत डिजाइन शहर के लिए आफत बनकर आ सकती है।
टीलों के कारण अस्सी से राजघाट तक गंगा के जलस्तर में लगातार कमी आ रही है, वहीं प्रवाह की निरंतरता पर भी असर पड़ा है। विशेषज्ञ पुल की डिजाइन पर सवाल खड़े कर रहे हैं तो वहीं इसे भविष्य के लिए बड़े खतरे की घंटी भी बता रहे हैं।
उधर, सेतु निगम के विशेषज्ञों का कहना है कि गंगा डेल्टा बनाने वाली नदी है। सामने घाट के पास घुमाव होने के कारण डेल्टा बन रहा है। इसे पुल के पायों की डिजाइन से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
दरअसल, सामनेघाट पुल के पायों के पास रेत के मैदान सरीखे बन गए हैं। पुल के पास ही नदी में बने बिजली के टॉवर के पास भी बालू के टीले नजर आ रहे हैं। पुल के सभी पायों के पास रेत के ऐसे टीले देखे जा सकते हैं।
इस तरह की स्थितियां यहां पहली बार सामने आई हैं और इसे लेकर नदी विज्ञानियों की पेशानी पर बल पड़ गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पुल के गोल पाये होने के चलते नदी का वेग इनके समीप कम हो जा रहा है।
ऐसे में पायों के पास और बीच में धीरे-धीरे बालू इकट्ठा हो जा रहा है। अगर इलेक्ट्रिकल पिलर बनाए जाते तो अविरलता प्रभावित न होती और नदी अपने वेग से गुजरती और बालू भी साथ निकल जाता। विशेषज्ञों का एक अनुमान है कि पुल बनने के बाद यहां 35 से 40 मीटर तक गंगा का प्रवाह इन टीलों की वजह से प्रभावित हो रहा है।
सेतु निगम के महाप्रबंधक एके श्रीवास्तव ने कहा कि सामनेघाट पर गंगा नदी में कर्व है। वहां नदी डेल्टा बनाती है। पुल के पायों की वजह से ऐसा नही हो रहा है।