रेत के टीले उभरने के साथ ही गंगा अब अस्सी से दशाश्वमेध घाट तक सीढि़यों से दूर हो गई हैं। अस्सी घाट से गंगा की दूरी 300 मीटर हो चुकी है। इसी तरह गंगा पार रेती का दायरा भी बढ़कर 12 किलोमीटर हो गया है। जून में गंगा का जलस्तर 57.78 मीटर तक पहुंचने और गंगा के प्राकृतिक स्वभाव में आए बदलाव से नदी विज्ञानी भी चिंतित हैं।
गंगा के जलस्तर में हर साल 0.5 से 38.1 सेंटीमीटर की कमी आ रही है। जून में हर दिन 0.05 सेंटीमीटर जलस्तर गिर रहा है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार पांच जून को गंगा का जलस्तर 57.90 मीटर, छह जून को 57.88, सात जून को 57.83 और आठ जून को 57.78 मीटर दर्ज किया गया।
इसी वजह से जलकल को पानी भी कम मिल रहा है। इसकी भरपाई ट्यूबवेल से की जा रही है। रेत पहले रामनगर किले के सामने जमा होती थी, लेकिन गंगा के प्रवाह में आए बदलाव के कारण अब पश्चिम के बजाय पूरब में रेत शिफ्ट होने लगी है।
आईआईटी बीएचयू के प्रोफेसर और गंगा लैब के प्रभारी रहे प्रो. यूके चौधरी ने बताया कि गंगा की प्रकृति में तेजी से बदलाव हो रहा है। सात से आठ मीटर तक बालू सतह से सात मीटर अंदर तक आ गया है। इससे गंगा का प्रवाह क्षेत्र प्रभावित हुआ है। रामनगर किला के बगल में गंगा की गहराई 10 से 12 मीटर बढ़ गई है।
गंगा पार बालू क्षेत्र की लंबाई सात से बढ़कर अब 12 किलोमीटर हो चुकी है। बालू क्षेत्र का विस्तार तो राजघाट पुल को पार कर चुका है। घाट की तरफ नगवा में तीन किलोमीटर में 10 से 15 मीटर का कटान हुआ है। गंगा रक्षेश्वर महादेव घाट पर बने नार्वे एंबेसी से मिले प्रोजेक्ट सरफेस वाटर से ग्राउंड वाटर डि्रकिंग का इंफ्रास्ट्रक्चर गंगा के पेट में समा गया है। गंगा दशाश्वमेध घाट तक घाटों से दूर हो चुकी है।
दशाश्वमेध घाट के बाद जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे, वैसे वैसे गंगा की गहराई भी बढ़ती जा रही है। यह खतरनाक है। भूजल का रिसाव भी तेज होने से शहर के भीतर जगह-जगह पर धसान की समस्या तेज होती गई।
उपाय
- गंगा के इको सिस्टम के बारे में सोचना होगा
- केवल प्रदूषण के बारे में बात करने से नहीं होगा सुधार
- गंगा में पानी का प्रवाह बढ़ाना होगा - गंगा के प्रोजेक्ट्स को रोजगारपरक बनाना होगा
- गंगा बेसिन में भूजल का अतिदोहन रोकना होगा