गंगा के गुनहगारों ने उसका स्वरूप विकृत कर दिया। इससे गंगा की धारा का दबाव शहर की तरफ बढ़ता गया। इस परिवर्तन से काशी के खूबसूरत गंगा घाट ध्वस्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं। इससे पेशवा श्री गणेश मंदिर, ग्वालियर घाट, बूंदी परकोटा घाट, गंगा महल घाट, संकठा घाट, सिंधिया घाट, भोसले घाट पर धंसने की शुरुआत हो चुकी है।
घाट की सीढ़ियां अब धीरे-धीरे सुरसरि की गोद में समाहित होने लगी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, नदी के रुख में ऐसा परिवर्तन उसके प्राकृतिक स्वरूप में छेड़छाड़ के चलते हो रहा है। 90 साल पहले ही इसकी चेतावनी लॉर्ड इर्विन ने जारी कर दी थी।
गायघाट से आगे बढ़ते ही बूंदी परकोटा घाट, शीतला घाट, लालघाट और हनुमान गढ़ी घाट पर गंगा की लहरों से अब घाट की सीढ़ियों तथा इमारतों के नीचे कटान शुरू हो गया है। सबसे खास बात तो यह है कि गंगा के बदलते स्वरूप के कारण किनारों पर गहराई बढ़ती जा रही है और बीच में गंगा की गहराई कम होती जा रही है।
किनारों की जगह मिट्टी गायब होती जा रही है, उसकी जगह गंगा का पानी हिलोरें ले रहा है। पेशवाओं की भव्य निशानियां गंगा की लहरों में ही समाहित हो जाएंगी। गंगा महल घाट, संकठा घाट, सिंधिया घाट, भोसले घाट, राजा ग्वालियर घाट, पंचगंगा, बिंदुमाधव घाट, दुर्गाघाट पर पेशवाओं द्वारा निर्मित महल आज भी सभी के आकर्षण का केंद्र हैं।
गहराई की बात करें तो पंचगंगा घाट के किनारों पर सबसे अधिक 26 मीटर गहराई हो चुकी है। अब नदी विशेषज्ञ आगाह कर रहे हैं कि गंगा का जलस्तर बढ़ाने की दिशा में गंभीर कदम नहीं उठाए गए तो इन धरोहरों को बचाना मुश्किल हो जाएगा।
केंद्रीय जल आयोग की ओर से 2015 में किए गए सर्वे के अनुसार यह बात सामने आई थी कि गंगा बीच की बजाय किनारों पर गहरी होती जा रही हैं। केंद्रीय जल आयोग के अधिकारियों का कहना है कि खनन पर रोक लगने के कारण यह समस्या आ रही है। इसके चलते घाट पोले होते जा रहे हैं।