अंतरराष्ट्रीय काशी घाट वाक विश्वविद्यालय का वार्षिक समारोह रविवार को मनाया गया। घाटवाक रीवा घाट से चलकर मानसरोवर व मणिकर्णिका से होता हुआ गायघाट पर समाप्त हुआ। इसके बाद गंगा पार रेती पर कबीर वाणी की प्रस्तुति हुई। सामासिक संस्कृति के प्रमाण के रूप में काशी के घाटों की विस्तार से चर्चा हुई।
रविवार को पंचगंगा घाट पर घाटवाक को संबोधित करते हुए संस्थापक न्यूरो चिकित्सक प्रो. विजय नाथ मिश्र ने कहा कि घाटवाक सृजन, स्वास्थ्य और शिक्षा तीनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इससे जुड़ने मात्र से व्यक्ति गति में आ जाती है और तमाम तरह की संकीर्णताओं से मुक्त हो जाता है। भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक व घाटवाक के मानद डीन प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि बनारस के घाट केवल ज्ञान के द्रष्टा ही नहीं हैं बल्कि सर्जक भी हैं। डॉ. दया शंकर मिश्र दयालु ने कहा कि काशी के घाट एक दूसरे को जोड़ते हैं।
ताना बाना समूह के देवेंद्र दास, गौरव मिश्र, कृष्णा और भगीरथ ने गुरु की करनी गुरू भरेगा... के साथ झीनी झीनी बिनी चदरिया... नामक कबीर भजन की प्रस्तुति दी। इस दौरान ग्रीन पुरुष के नाम से ख्यात मदन मोहन यादव, डॉ. अनिल सूर्यधर, मनकामना शुक्ल पथिक, उमेश गोस्वामी, डॉ. अमरजीत राम, जंत्रलेश्वर यादव, अष्टभुजा मिश्र, सत्यम, जितेंद्र कुमार, संतोष सैनी आदि मौजूद रहे।