क्यूम्यलोनिंबस बादलों की टकराहट से चमकती है बिजली
बिजली गिरने की घटनाओं का असर आम जन जीवन पर भी पड़ने लगा है। बिजली चमकने के कारणों पर आधारित बीएचयू के पर्यावरण एवं धारणीय विकास संस्थान में एक शोध चल रहा है।
एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुनीता वर्मा के निर्देशन में चल रहे शोध में प्रथम दृष्टया जो तथ्य सामने आया है, उसके अनुसार पूर्वोत्तर राज्यों में इस तरह की घटनाएं अधिक होती हैं। यहां प्री मानसून यानी बरसात का मौसम शुरू होने से पहले ही बिजली चमकती है।
डॉ. सुनीता वर्मा के निर्देशन में शोध छात्र प्रमोद यादव शोध कर रहे हैं। डॉ. सुनीता का शोध पत्र नेचुरल हाजरड्स जर्नल में प्रकाशित हो चुका है। उनका कहना है कि बिजली गिरना एक प्राकृतिक घटना है जो गरज वाले बादल के भीतर विपरीत चार्ज पृथक्करण और संचय के कारण घटित होती है।
इस तरह की घटनाओं में क्लाउड-टू-क्लाउड चार्ज का आदान-प्रदान हो सकता है, यानी इंट्रा-क्लाउड लाइटनिंग (जो बादल बना उसी के भीतर बिजली चमकती है) लाइटनिंग, या क्लाउड टू-ग्राउंड चार्ज का एक्सचेंज, यानी क्लाउड टू-ग्राउंड लाइटनिंग हो सकता है।
यूपी समेत देश के चार राज्यों में होती है सर्वाधिक मौत
डॉ. सुनीता का कहना है कि पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा संसद में साझा किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि बादल से जमीन पर गिरने वाली बिजली की घटनाओं से हर साल हजारों लोगों की जान जाती है। इससे होने वाली मौतों के मामले में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा और उत्तर प्रदेश देश के शीर्ष चार सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल हैं। प्री मानसून (मार्च, अप्रैल और मई) में उत्तर पूर्व क्षेत्र में सबसे अधिक बिजली गिरती है। जो नार्वेस्टर के कारण होता है।
मानसून सीजन में नार्दर्न क्षेत्र में भी प्रभाव
मानसून सीजन (जून जुलाई और अगस्त) में नार्दर्न पार्ट ऑफ इंडिया (जम्मू और कश्मीर) में भी घटनाएं देखने को मिलती हैं। इसका कारण जियोलाजिकल उत्पत्ति और पहाड़ी क्षेत्र है। इन नुकसानों को केवल सक्रिय मौसमों और बिजली गिरने के क्षेत्रों की पहचान करके ही कम किया जा सकता है।
वर्तमान में जो अध्ययन चल रहा है, वह राज्य/केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर भारत में रिपोर्ट की गई हताहतों की संख्या के साथ बिजली गिरने वाले क्षेत्रों की पहचान और सहसंबंध स्थापित करता है।
16 वर्षों के इमेजिंग सेंसर का विश्लेषण में भी शामिल
बीएचयू में चल रहे शोध कार्य में 16 वर्षों (1998-2013) की अवधि के लिए लाइटनिंग इमेजिंग सेंसर के मौसमी और मासिक समग्र उपग्रह डेटा का विश्लेषण किया गया है। डॉ. सुनीता के अनुसार इस अध्ययन में भारत के प्रमुख बिजली-प्रवण मौसमों और क्षेत्रों की पहचान का प्रयास भी किया जा रहा है।
मध्यप्रदेश में सबसे अधिक मौतें
भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, आकाशीय बिजली गिरने से मौतों का अनुमान भारत में आकस्मिक मौतों और आत्महत्याओं के आंकड़ों का उपयोग करके भी लगाया गया है। राज्यवार हताहतों की संख्या के अध्ययन से पता चलता है कि हर वर्ष औसतन सबसे अधिक मौतें मध्य प्रदेश (313 मौतें), महाराष्ट्र (281 मौतें) और उड़ीसा (255 मौतें) में होती हैं।
अनुकूल जलवायु परिस्थितियां, जैसे नमी सामग्री की उपलब्धता, अस्थिर वातावरण और मजबूत संवहन, उड़ीसा और महाराष्ट्र के क्षेत्रों में बिजली गिरने के गंभीर मामलों का कारण बनती है।
एलर्ट के लिए डाउनलोड करें दामिनी और सचेत एप
आकाशीय बिजली को ध्यान में रखकर जिला प्रशासन ने एडवाइजरी जारी की। जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की प्रभारी एडीएम वित्त एवं राजस्व वंदिता श्रीवास्तव ने बताया कि आकाशीय बिजली से दामिनी, सचेत एप बचाएगा। इसे गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड करें।
दामिनी एप लगभग 20 से 40 किमी के क्षेत्र में संभावित लाइटनिंग अलर्ट का नोटिफिकेशन देगा। यह मौसम, आंधी तूफान की सटीक जानकारी देगी। बताया कि यह एप मौसम विज्ञान विभाग ने विकसित किया है। वज्रपात से बचने के लिए पेड़ों के नीचे, मोबाइल टावर व ऊंचे मकान के नीचे शरण न लें। बच्चों को बाहर न खेलने दें, लोहे की खिड़की, दरवाजे व हैंडपम्प आदि को न छुएं।