बीएचयू हिंदी विभाग के प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल कहते हैं कि हिंदी आलोचना की एक ठसक भरी आवाज शांत हो गई। एक भरपूर, स्वाधीन और सक्रिय साहित्यिक जीवन जीते हुए प्रो. चौथीराम यादव ने इस जीवन को अलविदा कहा। एक बौद्धिक के साथ वे आंदोलन धर्मी रहे और स्त्री व दलित से जुड़े आंदोलनों में सक्रिय भी रहे। हाशिए के समाज से लेकर समाज के हाशिए तक को समझने में उनकी समान गति थी।
भक्तिकाल में कबीर और आधुनिक काल में हजारी प्रसाद द्विवेदी से जुड़कर उनकी आलोचना का विकास हुआ। बौद्धिक स्तर पर बुद्ध और आंबेडकर को एक साथ समझते थे। तकनीकी की दुनिया में भी गजब की रुचि थी। कह सकते हैं वह कि जीवन का पोर-पोर जीते थे।
आचार्य परंपरा की अंतिम कड़ी थे प्रो. चौथीराम
साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह कहते हैं कि प्रो. चौथीराम यादव काशी की आचार्य परंपरा के अंतिम कड़ी थे। विद्वता के साथ-साथ उनका सहज व्यक्तित्व उन्हें सबसे अलग करता था। भक्ति काल को नए ढंग से देखने की उनके अंदर समझ थी। सेवानिवृत्ति के बाद भी वह सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भागीदारी करते थे।
कई सम्मान से नवाजे गए थे प्रो. चौथीराम
प्रो. चौथीराम यादव को साहित्य साधना सम्मान, लोहिया साहित्य सम्मान, कबीर साहित्य सम्मान समेत कई सम्मान से सम्मानित किया गया। उनकी प्रमुख कृतियों में छायावादी काव्य : एक दृष्टि, मध्यकालीन भक्तिकाव्य में विराहनुभूति की व्यंजना, हिंदी के श्रेष्ठ रेखाचित्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी का समग्र पुनरावलोकन, लोक और वेद आमने-सामने आदि शामिल हैं।