‘सोएंगे तेरी गोद में एक दिन मरके, हम दम भी जो तोड़ेंगे तेरा दम भर के, हमने तो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू करके...।’ जिनकी लेखनी का एक-एक शब्द काशी की रूह को थामे हुए था, कलम ने जब भी कोई शेर गढ़ा, देश को सलामी दे गया। गंगा-जमुनी तहजीब को जीने वाले ऐसे शायर थे नजीर बनारसी।
देश के बंटवारे का दर्द जिनकी रुबाइयां बनीं, हिंदू-मुसलमान में फर्क को तार-तार करना जिनकी इबादत थी, ऐसे शायर थे नजीर बनारसी। काशी के घाटों-मंदिरों के बीच पले-बढ़े नजीर ने इसे शब्दों में क्या खूब गढ़ा था- ‘मैं वो काशी का मुसलमां हूं कि जिसको ऐ नजीर, अपने घेरे में लिए रहते हैं बुतखाने कई...।’
25 नवंबर, 1909 को मदनपुरा में जन्मे नजीर बनारसी का बचपन काशी की गलियों में बीता। घाटों-मंदिरों के इस शहर का असर उन पर गहराई तक था। शेर-ओ-शायरी को उर्दू के दायरे से निकालकर हिंदी के साथ मिलन कराने का फख्र उन्हें ही हासिल है।
पेशे से कभी हकीम रहे नजीर बनारसी ने अपने कलाम में हिंदी के हर्फों को पिरोया, ऐसी रुबाइयां लिखीं जो आसान थीं, उनमें उर्दू की बंदिश नहीं थी। बनारस, यहां की गलियों और गंगा पर उन्होंने जो लिख दिया, वे रचनाएं आज खुद नजीर बन चुकी हैं। बेबाक शायर नजीर बनारसी सच्चे बनारसी थे।
कहते हैं कि ‘बनारसी’ लफ्ज कुछ ही लोगों पर जंचता है, उनमें से एक थे नजीर। गंगा जिसके बिना बनारस पूरा नहीं होता, जो आठों पहर काशी के पांव पखारती है, भला नजीर और उनकी कलम कैसे इससे दूर रहती।
कभी गंगा के पानी से वजू कर उन्होंने मजहबी बंदिशों को ठोकर मारी तो कभी घाट पर मंदिरों के साए में थकान उतारकर उन्मादी ताकतों को उनकी हद दिखाई। यही वजह है कि उनके आशियाने को ‘कौमी यकजहती सेंटर’ के नाम से जाना जाता है जहां कभी हजारी प्रसाद द्विवेदी, मजरूह सुलतानपुरी, जिगर मुरादाबादी, कैफी आजमी से लेकर डॉ. संपूर्णानंद, गोपाल व्यास और हरिवंश राय बच्चन तक ने उन्हें ‘नजीर’ माना।