मेले में हर साल नेपाल और लखनऊ से बड़े कारोबारी भी आते है, जो खच्चर का छोटा बच्चा लेकर आते हैं और इसकी बिक्री कर बड़ा खच्चर खरीदकर ले जाते है। मेले में एक गधे-खच्चर की कीमत उसके साइज और क्वालिटी के हिसाब से 30 हजार से एक लाख तक होती है। मेले में यहां खरीदारों और बेचने वालों से स्थानीय स्तर पर सुविधा शुल्क की वसूली भी खूब होती है। इसे लेकर अक्सर किचकिच भी होती है।
जिले में वैसे देश का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला ददरी भी इसी जिले में आयोजित होता है। मगर गधों और खच्चरों के लिए अतिरिक्त मेला यह पितृपक्ष के दौरान आयोजित होता है। मेले से जुडे़ लोग बताते हैं कि देश में यह अपनी तरह का एकमात्र पशु मेला है जहां सिर्फ गधे और खच्चरों का कारोबार होता है।
1985 से लगता है सोनाडीह मेला
सोनाडीह मेले में आज से तीन दशक पूर्व 1985 में क्षेत्र के पड़री ग्राम निवासी धोबी समाज के लोगों ने मेले की शुरुआत की थी। तब से लेकर हर साल पितृपक्ष के दौरान मेला लगता चला आ रहा है। मेले की शुरुआत करने वालों में पड़री निवासी गरीब धोबी, सोनाडीह निवासी बुड़ावन धोबी, मऊ के रामपुर निवासी रघुनाथ, गाजीपुर के गौसपुर निवासी बरसाती धोबी आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं।