नदी विज्ञानी प्रो. यूके चौधरी ने बताया कि गंगा के जलस्तर में निरंतर गिरावट और भूमिगत जल के दोहन ने असि नदी को नाला बना दिया, क्योंकि भूमिगतजल का सतहीजल में परिवर्तन होने का नाम ही नदी है। जब भूमिगत जल का स्तर नदी के स्तर से नीचे जाएगा नदियां सूख जाएंगी। किसी भी नदी को बचाने के लिए बैंक स्टोरेज की स्थापना बेहद जरूरी है जो नदी के मूल प्रवाह को बरसात के बाद बरकरार रख सके।
बीएचयू के गंगा रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक वरुणा-असि नदी का अपना मौलिक जल, गुण, मात्रा और आवेग हुआ करता था। जो नगर के भूमिगत जल स्तर को संतुलित करने के साथ ही गंगा के कटान क्षेत्र में बंधा का काम करता था। इन नदियों का जल, गुण, मात्रा और आवेग का आपसी तालमेल जिस अनुपात में बिगड़ेगा नगर की स्थिरता व भूमिगत जल उपलब्धता तथा गुण का संतुलन भी उसी अनुपात में बिगड़ता जाएगा।
90 डिग्री कोण पर गंगा से मिला दिया असि को
काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व न्यास अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने कहा कि गंगा के दक्षिणी मोड़ पर मिलने वाली असि नदी को अब नदी मानने में कठिनाई होती है। वजह, इसका वजूद आज अस्सी नाला के रूप में ही शेष रह गया है। गंगा-वरुणा के सतह से काफी ऊंचाई पर बहने वाली इस नदी का गंगा में प्राकृतिक संगमीय कोण 45 से 60 डिग्री हुआ करता था। वर्तमान में अप्राकृतिक रूप से इसे स्थानांतरित कर दक्षिणी छोर पर ही तकरीबन 90 डिग्री कोण से गंगा में मिलाया गया है और इसमें नदी के एक भी चारित्रिक गुण नहीं है। जबकि प्राचीन पुराण काल में इसको शुष्का नदी के नाम से बहुधा पुकारा गया है। यहां तक कि इससे संबद्ध शिवलिंग का नाम भी शुष्केश्वर कहा गया है। जबालोपनिषद में इसका उल्लेख नाशी के रूप में किया गया है। काशी खंड में कहा गया है कि संसार के सभी तीर्थ असिसमेद के षोडशांश के भी बराबर नहीं होते। यहां स्नान करने से सभी तीर्थो के स्नान का फल मिल जाता है।