इस मूर्ति में भगवान शिव का एकमात्र मुख उकेरा गया है, जो शांत मुद्रा, जटामुकुट, गोल कुंडल, गले की माला और सूक्ष्म नक्काशी से सजा है। मूर्ति का ऊपरी भाग गोलाकार लिंग रूप में है, जो इसे शैव परंपरा का अनोखा उदाहरण बनाता है। यह खोज दाह संस्कार के दौरान की गई थी, जब यह एक ग्रामीण के खेत में गंगा तट पर मिली।
डॉ. सचिन तिवारी और डॉ. राकेश तिवारी ने इसे 9वीं-10वीं शताब्दी के गुर्जर-प्रतिहार काल की शैली का बताया, जो काशी-सारनाथ कला परंपरा से प्रेरित है। प्रोफेसर चौबे ने बताया कि इस खोज के बाद स्थल का वैज्ञानिक सर्वेक्षण और संरक्षण कार्य प्रस्तावित है। उन्होंने कहा, “यह मूर्ति न केवल वाराणसी की गंगा तटीय सभ्यता का प्रमाण है, बल्कि मध्यकालीन शैव परंपरा को समझने में महत्वपूर्ण साक्ष्य बनेगी।
एनएमएचसी में इसका प्रदर्शन इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाएगा।” भारतीय बंदरगाह रेल एवं रोपवे निगम लिमिटेड (आईपीआरसीएल) के तहत विकसित हो रहे एनएमएचसी में यह मूर्ति समुद्री विरासत के संदर्भ में प्रदर्शित की जाएगी, जो प्राचीन भारत की सांस्कृतिक यात्राओं को दर्शाएगी।
यह भी पढ़ें: काशी में मिली दुर्लभ एकमुखी शिवलिंग मूर्ति: जानकारों ने जताई शैव मंदिर होने की आशंका, सर्वेक्षण प्रस्तावित