शिव से पहले विष्णु की काशी का प्रमाण है बैकुंठ चतुर्दशी
काशी में शिव और विष्णु दोनों भगवान को समान रूप से पूजा जाता है। शिव से पहले काशी विष्णु का क्षेत्र रहा है। इसी मान्यता को साकार रूप देने के लिए बैकुंठ चतुर्दशी मनाया जाता है। शैव और वैष्णव की एकता का पर्व है। सौजन्य से बाबा विश्वनाथ और दंडपाणि महादेव के बीच में ही बैकुंठ महादेव का मंदिर भी है। इनका होने के बाद ज्योतिर्लिंग में बाबा का पूजन होता है। प्रांगण में बद्रीनाथ जी को भी बेल पत्र अर्पित किया जाएगा।
अन्नकूट पर बाबा को चढ़ेगा 56 भोग
छह नवंबर को धनतेरस पर धाम में स्थापित मां अन्नपूर्णा देवी की पूजा और खजाने का वितरण होगा। आठ नवंबर को दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश के मंदिर में पूजा कर दीप जलाए जाएंगे। नौ नवंबर अन्नकूट पर बाबा विश्वनाथ को 56 भोग अर्पित किया जाएगा। 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जगते हैं। धाम में गन्ना लगाकर आरती की जाती है। 23 नवंबर को बैकुंठ चतुर्दशी और 24 नवंबर को देव दिवाली होगी। ललिता और विश्वनाथ मंदिर घाट सहित गंगा द्वार और पूरे धाम को भव्य रूप से सजाया जाएगा।