इसके बाद वर्ष 2012 में खेलने के लिए दिल्ली आ गया। यहां कंधे में चोट लगी और लिंगामेंट इंजरी हो गई। आर्थिक समस्या आने पर वर्ष 2014 में फिर से राजेश मिश्र के पास छत्तीसगढ़ लौट गया। करीब एक वर्ष चोट से उबरने में लग गए। इसके बाद खेल में वापसी की और 2018 में टॉप टेन खिलाड़ियों की सूची में आठवां रैंक हासिल किया। इसी वर्ष राष्ट्रीय चैंपियन बना। गोवा में आयोजित राष्ट्रीय खेलों में यूपी को स्वर्ण पदक दिलाया।
टूर्नामेंट के पैसे से अगला मैच खेलता हूं...
उन्होंने बताया कि टूर्नामेंट जीतने पर जो पुरस्कार मिलता है उसी पैसे से अगले मैच की तैयारी करता हूं और खेलने जाता हूं। सबसे ज्यादा राष्ट्रीय खेलों में सात लाख रुपये मिले थे। इथियोपिया में फेडरेशन की ओर से आयोजित मैच में उपविजेता बना और दो हजार डॉलर की पुरस्कार राशि मिली।
सिद्धार्थ ने बताया कि विदेशी खिलाड़ी वर्ष में 35 से 38 सप्ताह मैच खेलते हैं। भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है। अगर अधिक से अधिक मैच आयोजित किए जाएं तो यहां के खिलाड़ियों की रैंक और उनके प्रतिभा का निखार संभव हैं। उन्होंने यह मुकाम वर्ष में 16 सप्ताह खेलकर हासिल किया है। बैक टू बैक मैच मिले तो और भी खिलाड़ी निकलेंगे और उनका प्रदर्शन भी शानदार होगा।
बीएचयू में खेलने के लिए करते थे घंटों इंतजार
सिद्धार्थ ने बीएचयू के पूर्व कुलपति प्रो. पंजाब सिंह के साथ एंफीथियेटर मैदान में सिंथेटिक कोर्ट पर उद्घाटन मैच खेला था। उन्होंने बताया कि टेनिस खेलने का ही जुनून था कि हर सुबह छह बजे बीएचयू पहुंच जाता था। उस समय बीएचयू के पूर्व कुलपति अभ्यास करते थे। उनके चले जाने के बाद कोर्ट पर खेलता था। एक बार पूर्व कुलपति ने सिद्धार्थ से पूछा की रोज तुम किस लिए इंतजार करते हो। बताया कि खेलने के लिए तो उन्होंने कर्मचारियों से कहा कि खिलाड़ी को खेलने दें। इसके बाद वह प्रतिदिन सिंथेटिक कोर्ट पर खेलता था।