माना जा रहा है कि इसमें बड़े गैंग का हाथ है जो लंबे समय से इसमें लिप्त हैं। पड़ोसी मुल्कों और बड़े शहरों में फाइव स्टार होटलों में इनकी काफी डिमांड है। इसी वजह से प्रतिबंधित जीव की बड़े पैमाने पर तस्करी की जाती है। तस्करी के लिए सबसे अच्छा साधन ट्रेनों के अलावा ट्रकों दवाई या खाद्य सामग्री के बीच बोरे में भरकर इन्हें ले जाने में सबसे मुफीद माना जाता है।
यही कारण है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन के साथ वाराणसी सहित अन्य स्टेशनों पर आए दिन कछुए बरामद होते हैं और तस्करों की गिरफ्तारी होती है। बंद बोरे या बैग के साथ विपरीत परिस्थितियों में जीवित रहने की शक्ति की वजह तस्कर कछुओं की आसानी से आसानी से तस्करी कर लेते हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन पर तीन वर्षों में दर्जनों बार से अधिक पुलिस हजारों कछुआ बरामद किए है।
स्टेशन पर सख्ती होने के बाद तस्कर सड़क मार्ग का उपयोग करने लगे हैं। सैयदराजा के नौबतपुर बार्डर पर ट्रक में भरकर कछुए तस्करी का भी खेल चल रहा है। बार्डर के कारण तस्कर कछुए लेकर निकल जाने में सफल हो जाते हैं। कई बार तो इसकी भनक तक नहीं लगती और काफी संख्या में कछुओं को पार करा दिया जाता है
होटलों में होता है इस्तेमाल
कछुओं की तस्करी कर उसका इस्तेमाल शक्तिवर्धक दवाओं के साथ ही होटलों में जूस के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। पीडीडीयू नगर से ट्रेन के जरिए और सैयदराजा में यूपी-बिहार बार्डर से ट्रकों में भरकर पार कराया जाता है। यूपी-बिहार बार्डर पर सड़क मार्ग के अलावा पीडीडीयू जंक्शन पर ट्रेनों से भी तीन साल में एक दर्जन से अधिक बार में एक हजार से अधिक कछुओं की बरामदगी की जा चुकी है।