मुख्तार अंसारी की ओर से तर्क दिया गया कि वर्तमान प्रकरण में राजनीतिक विद्वेषवश उसे जानबूझकर झूठा फंसाया गया है। इस पर अदालत ने कहा कि पत्रावली के अवलोकन से स्पष्ट है कि प्रकरण वर्ष 1986-87 से संबंधित है। यानी घटना की एफआईआर लगभग 37-38 वर्ष पुरानी है। मुकदमा 1990 में दर्ज हुआ। उस समय अभियुक्त की उम्र लगभग 22-24 वर्ष के आसपास रही होगी।
विधि विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट भी जुलाई 1993 की है। अभियुक्त की ओर से यह स्वीकार किया गया है कि उस समय उसका कोई राजनीतिक या आपराधिक इतिहास नहीं था। ऐसी दशा में एफआईआर को राजनीतिक विद्वेषवश दर्ज होना नहीं कहा जा सकता है। पत्रावली के अवलोकन से यह भी स्पष्ट होता है कि प्रकरण में अभियुक्त के विरुद्ध वर्ष 2021 में आरोप विरचित किया गया। उसके पश्चात ही साक्ष्यांकन की समस्त कार्यवाही संपन्न हुई। अतः उपरोक्त परिस्थितियों में अभियुक्त को फर्जी फंसाए जाने का तर्क किसी भी प्रकार से युक्ति युक्त प्रतीत नहीं होता है।