ठाकुर साहब ने अठन्नी तो जमा कर दी, लेकिन उनके दिलों-दिमाग में विद्रोह की आग जल पड़ी थी। तब शहर के आदित्य राम मंदिर में विद्यार्थी परिषद की बैठक हुई। बैठक में पं. हृदय नारायण तिवारी, मुनीश्वर मिश्र, केदारनाथ उपाध्याय, शिवदत्त तिवारी, नंदकिशोर चौबे और पं. परशुराम चतुर्वेदी (जो बाद में ख्यातलब्ध साहित्यकार हुए) सहित कुल 35 छात्र शामिल हुए। यहीं जार्ज पंचम की ताजपोशी का विरोध करने और महाबीरी झण्डा जुलूस निकालने की योजना बनी, जो अब तक कायम थी।
1942 में दमन के बाद भी 1943 में निकला था जुलूस
कौशिकेय ने बताया कि 1910 में पहली बार जुलूस निकाला गया। आजादी के आन्दोलन की कोख से निकले महाबीरी झंडा जुलूस को सौ साल पहले 1920 में आई वैश्विक आपदा स्पेनिश फ्लू भी नहीं रोक पाई थी। ब्रिटिश शासन के दौरान भी बलियावासी अपनी परंपरा को कायम रखने सफल रहे थे।
उस समय जुलुस में कोई झांकी नहीं होती थी, केवल महाबीरी झंडा लेकर लोग सड़कों पर निकलते थे। 1942 की अगस्त क्रांति के बाद ब्रिटिश फौज ने बलिया जिले में बहुत क्रूरता से दमनात्मक कार्रवाई की, लेकिन उसके अगले साल भी 1943 में महाबीरी झण्डा निकालने की इजाजत देनी पड़ी।
सात दिन तक सड़क पर जमा रहा जुलुस
जंग-ए-आजादी के इस जुलुस ने अनेक झंझावात भी झेले हैं। 1968 में हुए पथराव और गोलीबारी में चार लोग मारे गए थे। 1990 में यह जुलुस सात दिनों तक सड़कों पर खड़ा रहा। 2005 में तीन दिन तक भगवान महावीर की पूजा अर्चना होती रही। लेकिन यह पहला अवसर है, जब वैश्विक महामारी के कारण ऐतिहासिक जुलुस नहीं निकल पाएगा।
लॉकडाउन के कारण नहीं हो पाई तैयारी
कौशिकेय बताते हैं कि इस बार जुलूस नहीं निकालने के पीछे कई कारण हैं। एक तो जिला प्रशासन ने अनुरोध किया था। दूसरा इसके लिए व्यापक तैयारी की जाती है। लाकडॉउन के कारण जिले के सभी बाजार बंद होने से तैयारी नहीं हो पाई। इस समय लोगों के पास पैसों का भी अभाव है। चंदा की वसूली नहीं हो पाने से मूर्तियों का निर्माण नहीं हो पाया है। अखाड़ों में खेलने वाले बच्चों का महीनों पहले से होने वाला अभ्यास भी नहीं हो पाया है।