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काशी में धरोहरों का हाल: 237 साल पुरानी सूर्य घड़ी सड़क किनारे फांक रही धूल, सरकारी मशीनरी का नहीं जा रहा ध्यान

Sun, 17 Oct 2021 11:28 AM IST
उत्पल कांत जय नारायण सिंह यादव, अमर उजाला, वाराणसी

सार

वाराणसी में आयकर भवन के परिसर में 237 साल पुरानी सूर्य घड़ी धूल फांक रही है। बाउंड्री के अंदर सड़क किनारे बनी इस घड़ी के आसपास गंदगी के साथ ही सामने कई गुमटियां लगी हैं। जिससे इस पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता है। 
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आयकर भवन के पास सूर्य घड़ी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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काशी में धरोहर को संरक्षित करने के लिए केंद्र से लेकर प्रदेश सरकार की ओर से तमाम जतन किए जा रहे हैं। पुरानी काशी को हेरिटेज लुक दिया जा रहा है। वहीं, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय और मान मंदिर घाट पर मान महल में बनी वेध शाला और सूर्य घड़ी को संरक्षित किया गया, लेकिन चौकाघाट से मकबूल आलम रोड पर आयकर भवन के परिसर में 237 साल पुरानी सूर्य घड़ी धूल फांक रही है।

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बाउंड्री के अंदर सड़क किनारे बनी इस घड़ी के आसपास गंदगी के साथ ही सामने कई गुमटियां लगी हैं। जिससे इस पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता है। घड़ी का निर्माण तत्कालीन गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया लार्ड वारेन हेस्टिंग के आदेश पर 1784 में लेफ्टिनेंट फेम्स एल इनवर्ट ने कराया था।
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करीब दो सौ साल बाद 1976 में इसका जीर्णोद्धार नगर महा पालिका के तत्कालीन प्रशासक रामदास सोनकर ने कराया था। इसके बाद किसी सरकारी मशीनरी की नजर इस घड़ी पर नहीं पड़ी। नगर निगम प्रशासन इसकी देखभाल भी नहीं कर पाता है। घड़ी के आसपास की सफाई मंदिर का देखभाल करने वाले शारदा प्रसाद करते हैं। उनका कहना है कि नगर निगम की ओर कभी भी सफाई नहीं कराई जाती है। 

निजी संस्था ने कराई थी मरम्मत

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में सूर्य घड़ी - फोटो : अमर उजाला
2016 में निजी संस्था इंटैक के स्थानीय संयोजक अशोक कपूर ने आयकर विभाग और वीडीए से अनुमति लेकर इसकी सफाई के साथ ही आर्किटेक्ट मुदिता अग्रवाल से प्रोजेक्ट तैयार कराकर मरम्मत कराई थी। अशोक कपूर का कहना है कि इस पर करीब 80 हजार रुपये खर्च हुए थे। तत्कालीन मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण, वीडीए उपाध्यक्ष पुलकित खरे और आयकर विभाग के अधिकारी अभय ठाकुर ने मरम्मत के बाद इसका उद्घाटन किया था। 

क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. सुभाष यादव ने कहा कि  इस ऐतिहासिक घड़ी की जानकारी है। आयकर भवन परिसर स्थित घड़ी की देखभाल आयकर विभाग और नगर निगम की ओर से की जाती है। इन विभागों की ओर से इस घड़ी को धरोहर में शामिल करने, उसके संरक्षण के लिए प्रस्ताव आता है तो विभाग सहयोग करने को तैयार है। 
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सूर्य घड़ी ऐसे करती है काम

क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. सुभाष यादव कहते हैं कि सूर्य घड़ी अर्द्धचंद्राकार होती है। बीच में एक पत्थर का टुकड़ा जुड़ा होता है। अर्द्धचंद्राकार पत्थर पर घंटे और मिनट के निशान होते हैं। इस पर सूरज की रोशनी हमेशा पड़नी चाहिए। यह घड़ी छाया के सिद्धांत पर काम करती है। पत्थर पर पड़ने वाली रोशनी से जो छाया बनती है उसी के आधार पर घंटे और मिनट के बने निशान को देखकर समय का आकलन किया जाता है।

सूर्य घड़ी चूंकि सूरज की रोशनी के आधार पर समय बताती है, ऐसे में उसके आसपास कोई निर्माण नहीं होना चाहिए। बारिश या खराब मौसम को छोड़कर बाकी समय निरंतर सूरज की रोशनी पड़नी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है, इस 237 साल पुरानी घड़ी के आसपास निर्माण भी हैं और पेड़ के नीचे आ चुकी इस घड़ी पर रोशनी पड़ती ही नहीं है। 
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