संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में सूर्य घड़ी
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2016 में निजी संस्था इंटैक के स्थानीय संयोजक अशोक कपूर ने आयकर विभाग और वीडीए से अनुमति लेकर इसकी सफाई के साथ ही आर्किटेक्ट मुदिता अग्रवाल से प्रोजेक्ट तैयार कराकर मरम्मत कराई थी। अशोक कपूर का कहना है कि इस पर करीब 80 हजार रुपये खर्च हुए थे। तत्कालीन मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण, वीडीए उपाध्यक्ष पुलकित खरे और आयकर विभाग के अधिकारी अभय ठाकुर ने मरम्मत के बाद इसका उद्घाटन किया था।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. सुभाष यादव ने कहा कि इस ऐतिहासिक घड़ी की जानकारी है। आयकर भवन परिसर स्थित घड़ी की देखभाल आयकर विभाग और नगर निगम की ओर से की जाती है। इन विभागों की ओर से इस घड़ी को धरोहर में शामिल करने, उसके संरक्षण के लिए प्रस्ताव आता है तो विभाग सहयोग करने को तैयार है।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. सुभाष यादव कहते हैं कि सूर्य घड़ी अर्द्धचंद्राकार होती है। बीच में एक पत्थर का टुकड़ा जुड़ा होता है। अर्द्धचंद्राकार पत्थर पर घंटे और मिनट के निशान होते हैं। इस पर सूरज की रोशनी हमेशा पड़नी चाहिए। यह घड़ी छाया के सिद्धांत पर काम करती है। पत्थर पर पड़ने वाली रोशनी से जो छाया बनती है उसी के आधार पर घंटे और मिनट के बने निशान को देखकर समय का आकलन किया जाता है।
सूर्य घड़ी चूंकि सूरज की रोशनी के आधार पर समय बताती है, ऐसे में उसके आसपास कोई निर्माण नहीं होना चाहिए। बारिश या खराब मौसम को छोड़कर बाकी समय निरंतर सूरज की रोशनी पड़नी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है, इस 237 साल पुरानी घड़ी के आसपास निर्माण भी हैं और पेड़ के नीचे आ चुकी इस घड़ी पर रोशनी पड़ती ही नहीं है।