बच्चों के अधिकारों को लेकर कोई गंभीर नहीं है। हर जगह बच्चों के अधिकारों की अनदेखी की जाती है। आज भी बच्चों को होटलो-चाय की दुकानों में काम करते हुए, गुब्बारे और खिलौने बेचते हुए देखा जा सकता है।
सरकारी और गैरसरकारी संस्थानों के विभिन्न जागरूकता अभियानों के बावजूद बाल मजदूरी की समस्या खत्म नहीं हुई है। बच्चों को लेकर समाज के रवैये का अंदाज 14 नवंबर को बाल दिवस के मौके पर एक बच्चे को रोटी मांगने पर गोली मारने की घटना से जाहिर हो जाता है।
1959 में बाल अधिकारों की घोषणा 20 नवंबर 2007 को स्वीकार की गई थी। बाल अधिकारों में जीवन का अधिकार, पहचान, भोजन, पोषण ओर स्वास्थ्य, विकास, शिक्षा और मनोरंजन, नाम और राष्ट्रीयता आदि शामिल हैं। भारत में बच्चों की देखभाल और सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए मार्च, 2007 में राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार ने संवैधानिक संस्था बनाई है।