15 वर्षीय छात्र चंद्रशेखर तिवारी को गुस्सा आया और उन्होंने दरोगा को पत्थर मार दिया। पुलिस ने चंद्रशेखर को मजिस्ट्रेट के सामने पेश की। मजिस्ट्रेट ने चंद्रशेखर से उनका नाम पूछा तो उन्होंने आजाद बताया। वहीं मां का नाम धरती, पिता का नाम स्वतंत्रता और घर का नाम जेल बताया। मजिस्ट्रेट ने किशोर चंद्रशेखर का तेवर देख कर 15 कोड़े मारने की सजा सुनाई थी।
शिवपुर स्थित सेंट्रल जेल में बेंत की टिकठी से बांध कर आजाद को जेलर ने कोड़ा मारना शुरू किया तो हर कोड़े पर वह भारत माता की जय कहते थे। किशोर चंद्रशेखर जेल से बाहर आए तो उनकी बहादुरी और साहस का किस्सा काशीवासियों की जुबान पर था। इसके बाद ज्ञानवापी में हुई सभा में चंद्रशेखर तिवारी का नामकरण चंद्रशेखर आजाद किया गया।
काशी में क्रांतिकारी दल के सदस्य बने थे आजाद 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के मौजूदा अलीराजपुर जिले के भाबरा गांव (अब चंद्रशेखर आजाद नगर) में पंडित सीताराम तिवारी के घर आजाद का जन्म हुआ था। आजाद की मां जगरानी देवी उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थीं, इसी वजह से किशोरावस्था में पढ़ाई के लिए उन्हें काशी भेजा गया था।
ऐसे हुआ क्रांतिकारियों से संपर्क
सेंट्रल जेल में कोड़े मारे जाने की घटना के बाद आजाद पढ़ाई के दौरान ही काशी में क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए थे। काशी में मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के संपर्क में आजाद आए और निशानेबाजी में पारगंत होने के कारण सशस्त्र क्रांतिकारी दल के सदस्य बन गए। क्रांतिकारियों का यह दल हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ के नाम से जाना जाता था।
1922 में चौरीचौरा की घटना के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो कांग्रेस से आजाद का मोहभंग हो गया था। काकोरी कांड, अंग्रेज अफसर जेपी सांडर्स की हत्या और दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम विस्फोट जैसी घटनाओं में अग्रणी भूमिका निभाने वाले आजाद प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को वीरगति को प्राप्त हुए थे।