रात भर पिता इंतजार करते रहे। उन्होंने बताया कि मंगलवार को भी दिन में विजय का फोन नहीं आया, हालांकि दिन भर दशरथ यादव के घर पर लोगों का आवागमन होता रहा। फोन कर लोग बधाई देते रहे। आलम यह रहा कि सुबह से शाम हो गई लेकिन विजय के माता-पिता को खाने का मौका नहीं मिला।
गांव के कोच ने दिखाई सफलता की राह
विजय को उनके पिता दशरथ कुश्ती लड़ाना चाहते थे। डूहिया गांव में ही बसंतु खलीफा व्यायामशाला है, जिसे डूहिया अखाड़ा के नाम से भी जाना जाता है। विजय के पिता दशरथ यादव ने बताया कि बचपन में विजय गांव के लड़कों के साथ पहलवानी करते थे।
उसके बाद विजय अखाड़े पर जाने लगा और पढ़ाई करने के साथ ही कुश्ती भी लड़ना शुरू कर दिया, लेकिन एक दिन दशरथ की मुलाकात दांदूपुर के रहने वाले जूडो के कोच काशी यादव से हुई। उसके बाद शुरुआती दौर में काशी यादव ने ही विजय को जूडो का प्रशिक्षण दिया।
उन्होंने बताया कि काशी ने विजय की चंचलता को देखा और उन्होंने विजय को जूडो के लिए तैयार करना शुरू कर दिया। उस समय काशी गोरखपुर हॉस्टल में जूडो की ट्रेनिंग देते थे। 2009 में विजय को लेकर वे गोरखपुर चले गए, जहां खेल विभाग के क्षेत्रीय क्रीड़ा विभाग के स्पोर्ट्स स्टेडियम में चयन होने के बाद विजय ने वहीं पर जूडो की तैयारी शुरू कर दी।
विजय के पिता बताते हैं कि विजय करीब चार से पांच साल तक गोरखपुर में रहा। उसके बाद अच्छा प्रदर्शन के चलते सहारनपुर चला गया। सहारनपुर के बाद लखनऊ से दिल्ली और फिर भोपाल में रहने लगा। इस दौरान विजय यादव कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के बाद कॉमनवेल्थ गेम्स तक पहुंचा। इस पदक के बाद अब विजय का लक्ष्य पेरिस ओलंपिक पर है।
मौसेरे और चचेरे भाई भी है जूडो खिलाड़ी
पिता दशरथ यादव ने बताया कि तीन भाई और दो बहनों में विजय सबसे छोटा है। बड़ा भाई गुड्डू प्राइवेट बस चालक है और दूसरा भाई अजय यादव सेना में है। इनके अलावा विजय के मौसेरे भाई विवेक भी नेशनल जूडो खिलाड़ी हैं, जो इन दिनों भोपाल में विजय के नक्शे कदम पर चल रहे हैं। विवेक ने बताया कि विजय ने अपने गांव के कोच से प्रशिक्षण लेकर कॉमनवेल्थ गेम्स तक का सफर तय किया है। विजय के चचेरे भाई विशाल भी जूडो खिलाड़ी हैं।
विजय के गांव में नहीं है खेल मैदान
विजय के परिवार सहित गांव के लोगों ने बताया कि जिले के कई गांवों में खेल के मैदान बनवाए जा रहे हैं। सुलेमापुर गांव में खेल का मैदान नहीं है। लोगों ने कहा कि गांव में खेल का मैदान बन जाता तो गांव के बच्चों को भटकना नहीं पड़ता और शुरुआती प्रशिक्षण गांव में ही मिल जाता। ग्राम प्रधान दिनेश यादव ने बताया कि गांव में खाली भूमि नहीं है, जो सरकारी भूमि है, उस पर कब्जा है। यदि जमीन खाली करा दी जाए तो वहां पर खेल का मैदान बनवाने के लिए अधिकारियों से बात की जाएगी।