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बीएचयू में स्कंदगुप्त पर होगा मौलिक शोध

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काशी हिंदू विश्वविद्यालय में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान यह निष्कर्ष निकला कि स्कंदगुप्त पर मौलिक शोध के लिए बीएचयू में इंटरडिसिप्लिनरी केंद्र का निर्माण होगा। इसके माध्यम से स्कंदगुप्त के साथ ही अन्य गुमनाम नायकों की दास्तां को इतिहास में दर्ज कराया जाएगा। गुप्तवंशक वीर स्कंदगुप्त विक्रमादित्य का ऐतिहासिक पुरस्मरण एवं भारत राष्ट्र का राजनीतिक भविष्य विषयक संगोष्ठी के अंतिम दिन विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए।
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शुक्रवार को संगोष्ठी के प्रथम सत्र में विदेशी विद्वानों ने वैश्विक स्तर पर गुप्त साम्राज्य संस्कृति के अद्यतन प्रवाह एवं परंपर को स्वीकार किया। जापान के प्रो.ओइबा तकाई ने कहा कि प्राचीन काल में दक्षिण एशिया पर प्राचीन भारत खासकर गुप्तकाल का प्रभाव दिखता है। प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि पूर्वांचल के कई जिलों के डीएनए सैंपल के गहन अध्ययन किए गए लेकिन यहां के लोगों में हूणों का कोई डीएनए नहीं मिला।
प्रो. मारूतिनंदन तिवारी ने भारतीय कला के योगदान और गुप्तकाल के वैश्विक प्रभाव को स्पष्ट किया। थाइलैंड के प्रो. एनसी पंडा ने कहा कि थाईलैंड के राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में गरुण का प्रयोग उसी रूप में होता है जिस रूप में भारत में अशोक स्तंभ। डॉ. आनंद वर्धन और डॉ. अभिलाषा द्विवेदी ने गुप्तकाल के सैन्यप्रणली को काफी विकसित बताया कहा कि भारतीय लोकमानस एवं लोकगीतों में स्कंदगुप्त की वीरता की गाथा आज भी गायी जाती है।
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इस दौरान जेएनयू के प्रो. संजय भारद्वाज, डीएनए विशेषज्ञ डॉ. नीरज राय, डॉ. अखिलेश चौबे, प्रो. विभा त्रिपाठी आदि ने विचार प्रस्तुत किए। समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए भारत अध्ययन केंद्र के शताब्दी पीठ प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने कहा कि स्कंदगुप्त विक्रमादित्य को बार-बार याद करने की वजह ये है कि उसने बार-बार हूणों को भारत से बाहर ढकेला था। विस्तृत रिपोर्ट डॉ. अनूप पति तिवारी और संचालन प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी व धन्यवाद ज्ञापन संयोजक प्रो. राकेश कुमार उपाध्याय ने किया।
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