नारियल की जटा पर शोध करने वाले वैज्ञानिक
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नारियल की जटा को उपचारित किया गया। 50 डिग्री सेंटीग्रेड पर 72 घंटों तक सुखाया गया। फिर इसे बारीक पाउडर बना लिया गया। नारियल जटा के जल-आसवन के बाद, इसे एक घंटे के लिए 100 डिग्री सेंटीग्रेड पर घोल बनाया गया। लिग्निन और सेलूलोज को अलग करने के लिए फिल्टर किया गया। निकाले गए लिगनिन को बैसिलस आर्यभट्टई का उपयोग कर किण्वित किया गया।
इसके बाद किण्वित पदार्थ को फिल्टर किया गया। अवशेष को एक अलग फनल में स्थानांतरित किया गया और एथिल एसीटेट के साथ निकाला गया। 15 मिनट के लिए सेंट्रीफ्यूज करने के बाद सभी कार्बनिक तत्वों को केंद्रित किया गया। फ्लेवर का सेल लाइन अध्ययन के लिए परीक्षण किया गया, जो स्तन कैंसर के खिलाफ काम कर रहा था।
डॉ. अभिषेक दत्त त्रिपाठी ने बताया कि काशी में मंदिरों से बड़ी संख्या में हर दिन नारियल की जटा निकलती है। यह अपशिष्ट बायोडिग्रेडेबल है। अगर इसे ठीक से नियंत्रित नहीं किया जाता है, तो यह पर्यावरण के लिए खतरा पैदा करता है। यहीं नहीं कई सूक्ष्म जीव रोगों के लिए प्रजनन स्थल के रूप में भी यह कार्य करता है। इससे मंदिरों में वेस्ट मैनेजमेंट भी हो सकेगा।