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मालवीय भवन में जीवंत है महामना की यादें

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महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, लेकिन उन्होंने कभी भी पद को लेकर कोई अभिमान नहीं किया। साथ ही शिक्षकों, छात्रों आदि से उनका संवाद बना रहे, इस वजह से परिसर में स्थित मालवीय भवन में निवास स्थल बना दिया। 1920 से 1946 तक यहां रहने के दौरान महामना ने विश्वविद्यालय की स्थापना के विस्तार के साथ ही यहां पठन-पाठन, दीक्षांत समारोह सहित अन्य आयोजनों को लेकर न केवल बैठकें की बल्कि विश्वविद्यालय हित में लिए जाने वाले कई अहम निर्णयों का गवाह भी मालवीय भवन बना। आज जब बीएचयू स्थापना के 105 साल हो गए हैं, तो महामना की स्मृतियों को याद करना भी जरूरी है।
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कुलपति आवास के ठीक बगल में बने मालवीय भवन में आज भी महामना की यादें बसी हैं। इसी भवन में महामना हर दिन साधना भी करते थे। मालवीय भवन में विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद इसके संचालन, विस्तार आदि को लेकर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा देश-विदेश में किए गए भ्रमण, कुछ प्रमुख लोगों से बातचीत, बैठकों, कार्यक्रमों में शामिल होने की तस्वीर भी संरक्षित की गई है। साथ ही मालवीय भवन में प्रवेश करने के बाद एक कमरे में 25 साल से लेकर 75 साल तक की अवस्था की महामना की अलग-अलग प्रेरणादायी तस्वीरें भी लगाई गई हैं। इन सबके अलावा महामना की तबीयत खराब होने के बाद उनसे मिलने मालवीय भवन आए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की तस्वीर भी लगी है। इससे यह लगता है कि महामना के मालवीय भवन में रहने के दौरान कई महापुरुषों का आगमन भी हुआ।
दुर्लभ चित्रों का होगा नए सिरे से संरक्षण
मालवीय भवन के मानित निदेशक प्रो. उपेंद्र पांडेय का कहना है कि मालवीय भवन में महामना से जुड़ी सभी यादों को संरक्षित किया जा रहा है। यहां महामना के द्वारा बैठक, आयोजनों में भाग लेने आदि की जो भी दुर्लभ चित्र और अन्य सामग्रियां हैं, उसका नए सिरे से संरक्षण कराया जाएगा। महामना द्वारा जिस कुर्सी और मेज को उन दिनों बैठकों में शामिल किया जाता रहा, वह आज भी उसी तरह रखी गई हैं। छात्र-छात्राओं को इससे जुड़ी जानकारियां मिलती रहें, इसके लिए यहां लगाई गई दुर्लभ तस्वीरों को संरक्षित कराने की दिशा में जल्द ही पहल शुरू कराई जाएगी।
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बीएचयू को विशेष महत्व देने की जरूरत
महामना ने विश्वविद्यालय की स्थापना कर इतना महान कार्य किया, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह महामना की दृढ़ इच्छा शक्ति ही थी कि यह सबसे बड़ी संस्था के रूप में तब उभरकर सामने आया। आईएमएस बीएचयू में संकाय प्रमुख, अस्पताल में अधीक्षक और किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में कुलपति रही पद्मश्री प्रो. चूड़ामणि गोपाल कहती हैं कि बीएचयू को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान का दर्जा पहले से ही मिला है। सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी के हिसाब से जिस तरह का महत्व मिलना चाहिए, उसमें कहीं न कहीं कमी है। इस ओर सरकार को विशेष ध्यान देना चाहिए। प्रो. गोपाल का कहना है कि इंजीनियरिंग कृषि, चिकित्सा आदि के क्षेत्र में बीएचयू और संस्थानों से बहुत आगे हैं। बीएचयू जैसे संस्थान में 1973 से 2006 में सेवानिवृत्त होने के बाद 2014 तक एमेरिटस प्रोफेसर और अब आजीवन सेवा करने का मुझे सौभाग्य मिला है। यह मेरे लिए भी बड़ी उपलब्धि है।
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