बनारस क्लब के चुनाव में घमासान शुरू हो गया है। 18 सितंबर से यहां नामांकन प्रक्रिया शुरू हो जाएगी जो 21 सितंबर तक चलेगी। 22 को नामांकन पत्रों की जांच, नाम वापसी और फिर प्रत्याशियों की घोषणा की जाएगी। इसके पहले ही चुनाव की दौड़ में शामिल लोगों के मतभेद सतह पर आ गए हैं। मजेदार बात यह है कि इस खेल में सरकारी मशीनरी के कुछ आला अफसर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। शह और मात के इस खेल में 168 साल की गौरवशाली परंपरा वाले इस प्रतिष्ठित क्लब की शान को बट्टा लग सकता है, इससे इसकी साख गिर सकती है।
बनारस क्लब के सदस्यों में वर्चस्व की लड़ाई अब सड़क पर आ गई है। आला अफसरानों के चहेते सदस्यों का एक गुट इस तरह हावी है कि उसने दूसरे गुट के एक सदस्य के खिलाफ घेरेबंदी की और उसके खिलाफ आपराधिक कृत्य तक का घिनौना षड्यंत्र रच दिया गया। प्रशासनिक अधिकारी इस गुट की अंगुलियों पर नाच रहे हैं। इस सदस्य के प्रतिष्ठान के खिलाफ कार्रवाई की गई और कारण कुछ और ही बताया गया। जबकि दबी जुबान से आम लोगों में यही चर्चा है कि क्लब के एक धड़े विशेष के दबाव में आकर राजनीति के कारण ही उन्हें निशाने पर लिया गया है।
प्रशासनिक धड़े के करीबी गुट ने पहले दूसरे गुट के नेतृत्व करने वाले के खिलाफ यह प्रचार किया कि उन्होंने अफसरों के खिलाफ अपशब्द कहे हैं। अधिकारियों को भड़काया गया, चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल एक सामग्री को लेकर तूल दिया गया। बताया गया है कि रविवार को नामांकन के चलते एक गुट ने क्लब में हो रही तमाम अनियमितताओं के खिलाफ एक पर्चा छपवाया था जो चुनाव प्रचार के दौरान ही वितरित किया जाना था। इसमें आपत्तिजनक कुछ नहीं था, बल्कि पदेन सदस्यों की क्लब में अनुचित दखलंदाजी और सुविधाओं के बेजा इस्तेमाल पर सवाल उठाए गए थे। ऐसा तो लोकतंत्र के हर चुनाव में होता है। इसमें ऐसा कुछ नहीं था जो कि अलोकतांत्रिक हो। मगर, प्रशासनिक अधिकारियों को यह बात नागवार गुजरी। कारण, पर्चे की बातें अगर मुद्दा बनीं तो तमाम सरकारी अफसर भी विवादों में फंस सकते हैं।
मजेदार बात यह है कि इस पर्चे को बंटवाने की जिम्मेदारी एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को दी गई थी। इस कंपनी का मुखिया भी क्लब का सदस्य है। पुलिस ने उसको यह कहकर शनिवार को बलात घंटों थाने में बैठाए रखा ताकि उससे संबंधित गुट की अक्ल ठिकाने लगाई जा सके। उल्लेखनीय है कि जब यह पर्चा बांटा जा रहा था तो उक्त कंपनी का मुखिया शहर से बाहर था। पुलिस ने उससे टेलीफोन पर पूछताछ की। उसने बताया कि वह अपनी बीमार मां के इलाज के लिए बाहर है और आते ही पुलिस के सवालों का जवाब दे देगा। उसने किया भी यही और शनिवार को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के कैंप कार्यालय में हाजिर होकर अपना पक्ष रखा तो पुलिस ने उसे मानवाधिकार आयोग के तमाम नियमों और नसीहतों को दरकिनार कर हिरासत में ले लिया। हालांकि इस संबंध में कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई, पूछताछ के बहाने घंटों बैठाए रखा गया।