आईएएस बनने का ख्वाब देखने वाले बीएचयू के छात्र साकेत गर्ग ने आखिर क्या सोचा कि फांसी लगा कर जान दे दी। इसका जवाब परिवार को अब तक नहीं मिल पाया है। साकेत ने घटना से दो दिन पहले ही माता-पिता से बात की थी लेकिन किसी परेशानी का जिक्र नहीं किया था।
कुछ ऐसी ही कहानी बीएचयू के छात्र सोहन की भी है। बीएचयू इतिहास विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. स्वस्ति पांडेय और नुआंव गांव के पूर्व प्रधान ने फांसी लगा ली। जेल रोड पर कंसल्टेंसी कंपनी चला रहे एक युवा ने भी अपने ऑफिस में ही फांसी लगाकर जान दे दी।
बीते दो महीने में पारिवारिक विवाद और प्रेम प्रसंग में भी जान देने की घटनाएं हुई हैं और सभी मामलों में एक बात प्रमुख रही कि परिवार के लोगों को इस आत्मघाती कदम के पीछे के प्रारंभिक कारणों की जानकारी ही नहीं थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं की सबसे बड़ी वजह तनाव है। तनाव किसी भी वजह से हो सकता है। जब वह व्यक्ति पर हावी हो जाता है, तो समस्या से निजात के तौर पर उसके जेहन में जान देने का विकल्प सूझता है।
गर्मियों में ज्यादा परेशान होते हैं लोग
मार्च महीने में नौकरीपेशा और कारोबारी क्लोजिंग और इनकम टैक्स कटने से परेशान होते हैं। अप्रैल में बच्चों का रिजल्ट आता है, एडमिशन कराना होता है। कुछ लोग इससे पड़ने वाले मानसिक दबाव को सहन नहीं कर पाते हैं। परिवार के लोग भी कई बार इस समस्या को नहीं समझ पाते और व्यक्ति खुद को अलग-थलग समझ कर खतरनाक कदम उठा लेता है।
आठ घंटे की नींद जरूरी
डॉक्टरों का कहना है कि बेहतर काम करने एवं तनाव से मुक्ति के लिए आठ घंटे की नींद जरूरी है। दिन में चाहे जितना काम करें अगर रात में नींद पूरी हो गई तो अगला दिन अच्छा बीतेगा। नींद पूरी न होने की वजह से लोग परेशान होते हैं। उन पर तनाव हावी होने लगता है। वह धीरे-धीरे चिड़चिड़े होने लगते हैं।
ज्यादा नशा भी घातक
अक्सर लोग तनाव कम करने के लिए नशा करते हैं। कोई तंबाकू का सेवन करता है तो कोई शराब पीता है। काम के दौरान अगर किसी को बार-बार नशा करने की जरूरत पड़ रही है तो समझें कि संबंधित व्यक्ति पर तनाव हावी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादा नशा करने के बाद ही जान देने की बात दिमाग में आती है।
तनाव किसी को भी हो सकता है। अगर किसी को लगता है कि वह तमाम तरह के तनाव से ग्रसित है तो उसे समय रहते तनाव प्रबंधन विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए। सुदृढ़ मन से कठिनाइयों का सामना करना चाहिए। किसी भी मामले में हार और जीत तो जीवन की राह में धूप-छांह की तरह है। इनसे निराश होने की कतई जरूरत नहीं। - प्रो. संजय गुप्ता, मनोचिकित्सक, बीएचयू
एक असफलता से जीवन खत्म नहीं होता। छात्रों को ज्यादा से ज्यादा बातें अपने माता-पिता से साझा करनी चाहिए। माता-पिता को भी अपने बच्चों से घुल-मिल कर रहना चाहिए। उनसे ऐसे रिश्ते बनाएं कि वह आपसे हर बात कह सकें।
बच्चे अगर परेशान दिखें तो उन्हें काउंसलर के पास ले जाना चाहिए। - डॉ. अजय तिवारी, मनोविज्ञानी