पांच साल पहले पति के निधन के बाद बेटे को अनुकंपा के आधार पर बरेका में नौकरी तो मिली, लेकिन 2020 में उसे हटा दिया गया। जिसे फिर से बहाल कराने के लिए बरेका के चक्कर काटने को मजबूर हूं। साल भर से निशानेबाज बेटे की शैक्षिक योग्यता के मुताबिक नौकरी के लिए अधिकारियों से गुहार लगा रही हूं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं है। सरकारों ने भी कई वादे किए थे, लेकिन पूरा किसी ने नहीं किया।
पद्मश्री मोहम्मद शाहिद को याद करतीं परवीन।
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उन्होंने कहा कि शिलापट्ट उखाड़कर एक देश के एक ओलंपियन खिलाड़ी के साथ अपमानजनक और शर्मनाक है। इधर, बरेका में 30 साल तक क्रीड़ा अधिकारी रहे शाहिद के निधन के बाद बरेका खेल मैदान को मोहम्मद शाहिद का नाम देने का एक बोर्ड तो लगा, लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया। इसके लिए रेलवे बोर्ड ने बकायदा मंजूरी भी दी थी।
ये हैं उपलब्धियां
शाहिद 1980 में मास्को में हुए ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक विजेता भारतीय हॉकी टीम के सदस्य थे। इसके अलावा वह 1982 के एशियन गेम्स में रजत पदक और 1986 के एशियाड खेलों में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के भी सदस्य थे। उन्हें 1980-81 में अर्जुन पुरस्कार और 1986 में पद्मश्री से सम्मानित किया था। हॉकी को एक नया ड्रिबलिंग शॉट देने वाले शाहिद को उनकी खेल कला की बदौलत उन्हें द मैन ऑफ स्किल मोहम्मद शाहिद का भी खिताब मिला था।
पदक वापस करने के फैसले बाद शुरू हो पाई थी राष्ट्रीय प्रतियोगिता
20 जुलाई 2016 में ओलंपियन शाहिद के निधन के बाद से परिवार उपेक्षा का शिकार रहा है। 2018 में उनके नाम से प्रतियोगिता की मांग उठी। मांग पूरी न होने पर पत्नी ने शाहिद के सभी पदक लौटाने का ऐलान कर दिया था। हालांकि बाद में खेल विभाग और ओलंपिक संघ के आश्वासन के बाद परिवार मान गया। जिसके बाद मोहम्मद शाहिद के नाम से दो साल राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं हुईं जो फिलहाल साल भर से कोरोना के कारण स्थगित है।
इस बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं। यदि परवीन और उनके बेटे को कोई दिक्कत परेशनी है तो वो बरेका के जनसंपर्क कार्यालय में आकर अपनी समस्या रख सकते हैं। - राजेश कुमार जनसंपर्क अधिकारी, बरेका
शिलापट्ट हटाने की जानकारी अभी नगर निगम को नहीं थी। आपके माध्यम से जानकारी मिली है, जल्द ही इसे दुरुस्त कराया जाएगा। - देवी दयाल वर्मा, अपर नगर आयुक्त