वरिष्ठ पत्रकार पद्मपति शर्मा ने बताया कि मिर्जा गालिब के चिराग ए दैर में मंदिर का दीया और हर रंग का बनारस देखा जा सकता है। चिराग ए दैर में पता चलता है कि बनारस गालिब के सपनों के शहर जैसा था। वर्ष 1827 के आखिरी महीनों में कलकत्ते का सफर करते हुए वह करीब दो महीने के लिए बनारस में ठहरे थे।
उन्होंने पहले तो सिर्फ तीन दिनों के लिए काशी में रुकने की तैयारी की थी, लेकिन यहां के सम्मोहन में बंधे हुए गालिब पूरे दो महीने तक यहां ठहर गए। काशी की संस्कृति और जिंदादिली को फारसी मसनवी में समेटा। जिसको पूरी दुनिया चिराग ए दैर के नाम से जानती है।
गालिब की बनारस पर लिखी हुई इस मसनवी में एक सौ आठ शेर हैं और ये फारसी से सिर्फ उर्दू ही नहीं बल्कि संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी और बहुत सी दूसरी जबानों में तर्जुमा भी हो चुकी है। शायर हाजी फरमान हैदर ने बताया कि गालिब ने एक दरवेश से पूछा कि तमाम सारे पाप और अपकर्म के बाद भी दुनिया में कयामत क्यों नहीं आती है। दरवेश ने मुस्कुराकर काशी की ओर इशारा करते हुए जवाब दिया कि वजह ये मुकद्दस शहर है।