मालिनी अवस्थी ने कहा कि आजादी के बाद 1952 में संस्कृति मंत्री ने कानून लाकर तवायफों के रेडियो पर गाना गाने पर प्रतिबंध लगा दिया। उस संगीत का चलन बंद हो गया। इनको अश्लील बोला गया, लेकिन अभिनेत्रियां आज की रात मजा हुस्न का आंखों से लीजिए... जैसे गीत पर नाच रही हैं और माता-पिता भी खुश हैं। संगीत को लेकर सोच बड़ी करनी होगी। 1940 में अंग्रेजी सरकार में ये प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन आजादी के बाद उस संगीत के अवशेष ही नहीं बचे। इसके बाद तो उनकी प्रतिष्ठा और पहचान का संकट हो गया। लखनऊ के चौक और दालमंडी में इसके अवशेष भी नहीं हैं।
मालिनी अवस्थी ने एक और पुराना जिक्र छेड़ा। बताया कि नैना बाई भारतेंदु का पद गा रहीं थीं तो उसे सुनने खुद भारतेंदु आए थे। उन्होंने कहा कि आपके भाव अच्छे नहीं हैं। भारतेंदु ने उनका घुंघरू मांगा, फिर गाकर अपने भाव दिखाए, तब नैना बाई ने पैर छू लिए। ये बनारस के सुधि श्रोता और बिना अहंकार के कला का संगम था।
मालिनी अवस्थी ने कहा कि महात्मा गांधी ने गायिकाओं से कह दिया कि अब आप लोग अपने संगीत रसिकों का मन बहलाना बंद करिये। देश के लिए गाइए। इस पर हुस्नाबाई लोहे के कड़े पहनकर अस्सी पर हो रही मजलिस में पहुंचीं और कहा कि आपने कैसे कह दिया कि हम लोगों का मन बहलाते हैं। हमने साधना कर गायन सीखा है। अब आप कह रहे हैं तो हम देश के लिए गाएंगे। इसके बाद विद्याधरी बाई ने गाया, चुन चुन के फूल ले लो अरमान रह न जाए, ये हिंद का बगीचा गुलजार हो न जाए...।
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जिनका दिल नहीं टूटा वे क्या गाएंगे ठुमरी
ठुमरी गाना आसान नहीं। भाव, रस और प्रेम में दिल नहीं टूटा है और जलालत नहीं सही तो ठुमरी दादरा असर नहीं कर सकती। आज लोकगीतों को गाने वालों का नाम कोई नहीं जानता। बनारस की ठुमरी को समझना है तो चार कंठ साधक रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी और महादेव मिश्र को सुनना ही होगा। मैं भारतेंदु की कजरी और सखी संप्रदाय की रचनाएं गाती हूं। इनके अलावा काशी बाई, हुस्ना बाई, विद्याधरी बाई, दुलारी बाई बनारस की लोक गायिकाएं रहीं।