महामना के मन मस्तिष्क में जिस वक्त काशी हिंदू विश्वविद्यालय की परिकल्पना पल रही थी, उस वक्त देश में भारी उथल-पुथल थी। ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी में जकड़े लोग आजादी की सांस लेना चाह रहे थे। उस दौर में राष्ट्रीय शिक्षा को जरूरी माना जा रहा था। महामना काशी में बीएचयू का सपना देख रहे थे तो महाराजा दरभंगा सर रामेश्वर सिंह भी वाराणसी में शारदा विश्वविद्यालय की स्थापना करने की सोच रहे थे। लंदन में जन्मी एनी बेसेंट ने भी यहीं ‘यूनिवर्सिटी ऑफ इंडिया’ शुरू करने का लक्ष्य रखा था।
इन तीनों की महानुभावों की इच्छा, लक्ष्य एक ही था। फिर क्या था। महामना ने इन दोनों को अपने साथ लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्हें पता था कि बीएचयू के सपने को मूर्त रूप देने के लिए न सिर्फ लोगों का समर्थन चाहिए बल्कि एनी बेसेंट व दरभंगा महाराजा का साथ ही जरूरी है। बीएचयू के लिए उन्होंने 1910 में वकालत छोड़ दी। पहले महाराजा दरभंगा से मिले। महाराजा दरभंगा उनका साथ देने को राजी हो गए। लेकिन इस शर्त पर कि पहले भारत सरकार हिंदू विश्वविद्यालय की योजना को अपना समर्थन दे दे। इसके लिए महामना के साथ दरभंगा नरेश 11 अक्तूबर 1911 में वायसराय लार्ड हार्डिंग्ज और शिक्षा सदस्य हरकोर्ट बटलर से मिले। जब भारत सरकार से पूरा समर्थन मिलने का आश्वासन मिल गया जब दरभंगा नरेश महामना के साथ आ गए। महाराजा ने विश्वविद्यालय के लिए पांच लाख रुपये का दान भी दिया।
अब महामना को एनी बेसेंट को अपनी ओर करना था। 1911 में ही महामना ने एनी बेसेंट से मुलाकात की। यह वही समय था, जब एनी बेसेंट ने 1911 में सरकार को अपनी यूनिवर्सिटी खोलने का प्रस्ताव दिया था लेकिन सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। बता दें कि एनी बेसेंट की यूनिवर्सिटी के लिए तीन मुसलमानों ने समर्थन दिया था लेकिन बाद में उन्होंने खुद को अलग कर लिया था। हालात ऐसे बन गए थे कि एनी बेसेंट ने महामना की योजना को समर्थन दे दिया। और फिर 22 अक्तूबर 1911 को मालवीयजी, एनी बेसेंट और महाराजा दरभंगा की योजनाएं और कल्पनाएं मिलकर एक हुईं और ‘हिंदू यूनिवर्सिटी’ की बुनियाद का आगाज हो गया।