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दादुर शोर करत हियरा में कोयलिया कूं कूं कुहुंकत...

Fri, 15 Jul 2016 02:14 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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प्रो. चित्तरंजन ज्योतिषी
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मल्हार जीवन और प्रकृति दोनों में समान रूप से समाहित है। यह वो राग है जो मन की मलीनता को हर ले जाता है। हृदय में भरे दुखों को निचोड़ देता है। कुम्हलाई, मुरझाई पत्तियों से धूल ही नहीं हटती, वह कनकना जाती है। मल्हार शास्त्र में राग है तो लोक में आनंद का गीत। वो गीत जो जीवन में उल्लास पैदा करता है। सूखे सीवान में क्यारियां जब हरियाली की घनी चादर ओढ़ लें। मोर पंख पसार कर नाचने लगें, चहुंदिशि गीत गूंजने लगें और रास-रंग शुरू हो जाए, तब होता है मल्हार।
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लोक में गाई जाने वाली धुनें ही बाद में रागों में निबद्ध हो गई हैं। ऐसी धुनें जो वर्षाकाल में गाई जाती हैं, उनकी अपनी विशिष्टता है। आषाढ़ के मेघों का अपना रंग-मिजाज होता है और सावन की रिमझिम फुहारों का अलग। भादों में दिन में रात जैसा अंधेरा पैदा करने वाली घटाओं का अपना संगीत होता है। जिस तरह से वर्षा कई प्रकार की होती है, उसी तरह से मल्हार के भी विविध प्रकार हैं, जो जीवन के विविध आयामों को स्पर्श करते हैं। यह कहना है राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय ग्वालियर के पूर्व कुलपति प्रो. चित्तरंजन ज्योतिषी का।


प्रो. ज्योतिषी कहते हैं कि कवियों ने पावस ऋतु में बादल, बिजली, वर्षा के अनुसार गीत लिखे हैं। प्रकृति के इन स्वरूपों को छंदबद्ध किया गया है। आषाढ़ के बादल गरज-तरज लेकर आते हैं तो आशा जग जाती है। उम्मीदें बंध जाती हैं, उन सांवरे-सलोने बादलों से। जो घहराते-मंडराते, घिरते-घोरते हुए आते हैं। गरजते, तरजते हैं। इस तरह घनघोर घटाएं घिरती हैं कि मन में डर पैदा हो जाता है। आषाढ़ के बादलों की यह जो प्रवृत्ति है, वह मल्हार के विविध अंगों में दर्शाई गई है। वर्षा ऋतु के तीन महीनें आषाढ़, सावन, भादों आनंद और मंगल के मास हैं।
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इन महीनों में सिर्फ विरह की ही अनुभूति नहीं होती। झूले भी लगते हैं और मेले भी। आषाढ़ के मेघों की ओर किसान भी टकटकी लगाए रहते हैं और विरहिन भी। दोनों को बारिश की बूंदों का इंतजार रहता है। वर्षा होते ही विरह खत्म हो जाता है। वह विलंबित एक ताल में सुर मल्हार की बंदिश पर अलाप लेते हैं- गरजत आए बादर कारे/अति ही मन भाए/गरज गरज चहुंओर बरसे/तब ही सदारंग सुख धाए...। इसी राग में द्रुत लय की बंदिश वह गुनगुनाते हैं- बादरवा बरसन को आए/नन्हीं नन्हीं बूंदन/गरज गरज अति/चहुंओर ते बिजुरिया चमकत/उमंग मन में मोरवा नाचे...। दादुर शोर करत हियरा में/ कोयलिया कूं कूं कुहुंकत/बादरवा बरसत ....। वह कहते हैं कि स्त्री, पुरुष ही नहीं, पशु, पक्षी सभी मुग्ध हो जाते हैं। पंछी पंख खोलने लगते हैं। पावस ऋतु में कोयल गाने लगती है। दादुर (मेढक) ताल लगाता है और  मोर नाचने लगते हैं।


कठफोड़वा बांस के पोरों में छेद कर देते हैं। पुरवाई सनन सनन चलती है तो उससे मीठे स्वर गूंजने लगते हैं। सारी प्रकृति खिलखिला कर नाच उठती है। आम खट्टा से मीठा हो जाता है। उसमें सुगंध भर जाती है। सुग्गा का ढोर लग जाए तो वह फल और भी मिठास से भर जाता है। सावन की फुहारों का अपना संगीत होता है। वह राग गौड़ मल्हार की बंदिश पर आलाप लेते हैं-झुकि आई रे बदरिया सावन की/सावन की मन भावन की...। सावन में उमग्यो मेरो मनवा/छांड़ि गयो परदेस पियरवा/ सुध न रही घर आवन की...।
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