विभागीय अफसरों, कर्मियों में उनके निर्देश, आदेश क्या, इशारों पर कार्य संपादन हो जाता था। यही कारण है कि अपने क्षेत्र चंदौली, बनारस, उत्तर प्रदेश या केंद्र सरकार में विकास के कामों की ऐसी छाप छोड़ी, जिसके लिए आधी सदी बाद की पीढ़ियां ही उन्हें शिद्दत से, श्रद्धा से याद करती हैं।
आज धन आधारित राजनीति का बड़ा बोलबाला है, पर बाबू ने तो सदा जन आधारित राजनीति की। पच्चीसों मील पैदल चल चल कर भी गांव-गांव घूमना एवं गांधी का संदेश पहुंचाना। जैसे पारस को छूकर सोना बन जाता है, वैसे ही गांधी से जुड़ कर आम आदमी भी बड़े बन गये, बाबू भी उनमें थे। हमें भी ईमानदारी से जीने की नसीहतें दीं। बीएचयू से पढ़ाई के बाद एक बार कलकत्ते गया और लौटने का आरक्षण न था।
ट्रेन की स्लीपर बोगी में चढ़ गया। उम्रदराज बंगाली कंडक्टर ने चेक किया तो नीचे उतारने को कहा। मिन्नत से नहीं माना, तो मैंने कहा कि मेरे दादा ही रेलमंत्री हैं। और भड़क कर उन्होंने अगले स्टेशन पर धक्का दे उतार दिया।
वह परंपरावादी सनातनी पंडित थे, तो आधुनिक एवं सेकुलर साख वाले राजनेता, पत्रकार एवं लेखक भी। संकल्प शक्ति के बड़े धनी थे। पेरोल पर बीमार धर्मपत्नी को देखने जेल से आए थे और उसी दिन सहसा हमारी दादी का निधन भी हुआ। उन्हें बच्चों का ध्यान का वचन दिया, तो उनकी आम खाने की अंतिम इच्छा नहीं पूरी कर सके। तभी उनके अप्रत्याशित निधन ने 29 की उम्र में विधुर बना दिया।
तब दो संकल्प लिए कि विवाह नहीं करूंगा और जीवन में कभी आम नहीं खाऊंगा। कुल 85 वर्ष की उम्र तक जिए, पर दबावों एवं छोटे पांच बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी के बावजूद न तो फिर विवाह किया और न कभी प्रिय फल आम को हाथ लगाया। यह संकल्पशक्ति निजी जीवन में ही नहीं, सार्वजनिक जीवन में दल, सिद्धांत, विचारधारा, नेतृत्व सभी की एकनिष्ठा से उन्हें जोड़े रही।