शहीदाने करबला की याद में सदर इमामबाड़ा परिसर लाट सरैया में अंजुमन आबिदिया समेत शहर की 27 अंजुमनों के सहयोग से रविवार को 72 ताबूतों का पहली बार जुलूस उठाया गया।
सुबह से ही लोग सदर इमामबाड़ा पहुंचने लगे थे। दोपहर तक अकीदतमंदों से पूरा इमामबाड़ा भर गया। काले लिबास में लोग करबला के शहीदों को पुरसा देने के लिए उमड़ पड़े।
जुलूस का आगाज आबिद अब्बास ने कुरान की तिलावत से हुआ। छोटे बालक हाशिम ने पेशख्वानी की। इसके बाद शायर सुहेल बस्तवी और कलीम बिजनौरी ने अपने कलाम से लोगों की आंखें नम कर दीं।
इसको कहते हैं शहादत, इसको कहते हैं शहीद, कट गए सबके गले लेकिन मरा कोई नहीं...।
कलीम बिजनौरी ने जब यह शेर पढ़ा तो लोग फफक पड़े। इसके बाद मौलाना नजर मोहम्मद जैनबी ने कहा कि करबला के शहीदों ने भाईचारे और मुहब्बत का जो पैगाम पहुंचाया है, वह ही सबसे बड़ी इबादत है।
इस दौरान खुर्शीद असरी के दर्द भरे नौहों से अकीदतमंदों की आंखें नम हो गईं।
इसके बाद इमामबाड़ा परिसर में ताबूत निकलने का सिलसिला शुरू हुआ। ताबूत का परिचय जीशान आजमी ने कराया। 54 ताबूत इमाम हुसैन के 54 चाहने वालों के और 18 उनके परिवार के सदस्यों के थे।
इन ताबूतों की जियारत के लिए सैलाब उमड़ पड़ा। आखिर में इमाम हुसैन की जियारत में अंजुमन चिरागे अली कमालपुरा ने नौहा मातम किया।
इस दौरान जोहैर सुलतानपुरी ने भी नौहे पेश किए। लोगों का इस्तकबाल शामिल रिजवी, जहीर हैदर, अमीन रिजवी, अब्बास कैफी, वजीर हसन, फरीद हसन ने किया।
अंजुमन के सचिव शमशाद हुसैन, सैयद फरमान हैदर ने शुक्रिया अदा किया और संचालन डॉ. शफीक हैदर ने किया।
इस मौके पर मौलाना शमीमुल हसन, मौलाना कैसर नजफी, मौलाना अकील हुसैनी, मौलाना नदीम असगर, मौलाना बदरुल हसन, मौलाना तनवीर हुसैन आदि मौजूद थे।