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गत वर्ष दिवाली के बाद बनारस की हवा हो गई थी बेहद खराब, इस बार भी आशंका

Thu, 19 Oct 2017 05:01 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
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आतिशबाजी - फोटो : अमर उजाला वृंदावन
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दिवाली खुशियों का त्योहार है। इस दिन ज्यादा पटाखे चलाने से पर्यावरण प्रभावित होता है। प्रदूषण नियंत्रण विभाग और जिला प्रशासन के  बीते साल दीपावली के बाद खतरनाक स्तर पर पहुंचे प्रदूषण और स्माग की घटना से सबक नहीं लेने के कारण इस बार भी ऐसी ही आशंका है।
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तब लोगों को सांस लेने में परेशानी होने लगी। फेफड़े के मरीजों की संख्या बढ़ने लगी। तमाम लोग अस्पताल पहुंच गए थे। दिवाली के सप्ताह भर बाद स्थिति सामान्य हुई। उस समय प्रदूषण बढ़ने का कारण खस्ताहाल सड़कों टूटी सड़कों पर धूल उड़ती थी और धूल का गुबार बना रहता था। इस साल निर्माणाधीन कार्यों की संख्या बढ़ गई है। 

 2016 में दिवाली से पहले शहर में करीब एक सप्ताह तक स्माग की स्थिति थी। कई बार दिन में ही अंधेरा हो गया था। फिर आई दिवाली पर हुई आतिशबाजी के कारण अगली सुबह पीएम 10 और पीएम 2.5 अनुमन्य मानकों से15 से 20 गुना अधिक  हो गया था। यहां का वायु प्रदूषण लखनऊ और कानपुर से ज्यादा था। दिवाली के चार दिन बाद तक हवा में धुएं के रूप में चादर छाई रही। 
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पीएम 2.5 और पीएम 10 की अधिकतम अनुमन्य सीमा शून्य से 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर है। जब ये तत्व बढ़ते हैं तो अपने दायरे में आने वाले लोगों और विशेषकर बच्चों, बुजुर्गों और सांस से संबंधित समस्याओं से जूझ रहे लोगों को घातक रूप से प्रभावित करते हैं। 

जानलेवा होता है पटाखों का धुआं

धुंध्‍ा
बीएचयू के टीबी-चेस्ट रोग विभाग के प्रो. जीएन श्रीवास्तव आतिशबाजी को स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताते हैं। बताया, दिवाली पर जलाए जाने वाले पटाखों के धुएं से सल्फर डाई आक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, कार्बन डाईआक्साइड जैसी विषैेली गैसें निकलती हैं।

साथ ही मैग्नीजियम, आर्सेनिक, कैडमियम होने से पटाखा जलने के  समय धुएं का बादल बन जाता है। पहले से फेफड़े, सांस की बीमारी से ग्रसित मरीजों के साथ ही स्वस्थ लोगों पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ता है।

एक ओर जहां स्वस्थ लोगों को खांसी, बलगम आना या गले में खराश होने और दम घुटने जैसी परेशानी होती है वहीं पर पहले से प्रभावित मरीजों को जानलेवा अटैक हो सकता है।

उनकी सलाह है कि अस्थमा या ब्रोंकाइटिस के मरीजों को दवा जरूर लेना चाहिए। सुबह टहलने में भी सावधानी बरतना चाहिए, क्योंकि वातावरण में धुएं के कण रहते हैं।
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बीते साल खतरनाक स्तर पर था प्रदूषण

प्रदूषण - फोटो : GettyImages
31 अक्तूबर, 16 की सुबह वाराणसी के सोनारपुरा चौराहे पर पीएम 2.5 कण 990, पीएम 10687.9 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पाया गया। लंका पर क्रमश: 432.6 और 482, गोदौलिया चौराहे पर 541.5 और 720.1 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर पाया गया।

सारनाथ में पीएम 2.5 की मात्रा 463 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर और पीएम 10 की मात्रा 419 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर पाई गई। मच्छोदरी इलाके में पीएम 2.5 की मात्रा 632.8 और पीएम 10 की मात्रा 815.8 थी।

इससे पहले 2015 में भी प्रदूषण की स्थिति ठीक नहीं थी। तब लंका पर क्रमश: 385.6 और 340, गोदौलिया चौराहे पर 450.5 और 601.1 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर था।
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