90 के दशक तक अदालतों की भाषा भी अलग थी। जज के सामने अधिवक्ताओं के मुंह से निकलता था हुजूर इंसाफ की गुहार है, मुल्जिम बेकसूर है जनाब, अदालत से रहम की अपील है। इन शब्दों में पेशे की तहजीब, नाटकीयता और एक किस्म का अदब था। अब अदालतों में हिंदी और अंग्रेजी का मिला-जुला व्यावहारिक शब्दकोश ज्यादा सुनाई देता है। लेकिन, सबसे बड़ा बदलाव भौतिक ढांचे और पेशे की संस्कृति में आया। 25 साल पहले परिसर ज्यादा खुला, साफ-सुथरा और अपेक्षाकृत शांत था।
अब अधिवक्ताओं की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। बार एसोसिएशन का आकार बड़ा हुआ, न्यायालय भवन बढ़े लेकिन बैठने की जगहें अब भी संघर्ष की कहानी कहती हैं। खपरैल के नीचे बैठने वाले वकील निजी प्रयासों से टीनशेड तक पहुंचे। पक्के चैंबर आज भी सीमित हैं। गर्मी और बरसात अब भी टिनशेड और पुराने पंखों के भरोसे कटती है। चाय, पकौड़ी और उधारी वाले जलपान गृह आज भी कचहरी की संस्कृति का हिस्सा हैं। बाहर भले वातानुकूलित रेस्टोरेंट खुल गए हों, लेकिन अधिकतर अधिवक्ता आज भी उन्हीं पुराने ठिहों पर मिल जाते हैं, जहां बहस कानून से ज्यादा राजनीति और शहर पर होती है।
हाथ के टाइपराइटर की खट-खट अब कंप्यूटर कीबोर्ड में बदल चुकी है, लेकिन काम का दबाव पहले से ज्यादा है। जूनियर अधिवक्ताओं की नई पीढ़ी ज्यादा आत्मनिर्भर और तकनीकी रूप से सक्षम है। गुरु-शिष्य परंपरा कमजोर हुई है, लेकिन प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। बनारस बदल गया, शहर की रफ्तार बदल गई, अपराध का चेहरा बदला, वकालत का तरीका बदला लेकिन कचहरी अब भी वही है। थोड़ी थकी हुई, थोड़ी भीड़भाड़ वाली, थोड़ी अव्यवस्थित, मगर अपने भीतर शहर का असली चरित्र संभाले हुए। -एडवोकेट मंगलेश दुबे, पूर्व अध्यक्ष, सेंट्रल बार एसोसिएशन