आचार्य रामचंद्र शुक्ल 20वीं शताब्दी के हिंदी के प्रमुख साहित्यकार थे। उन्होंने हिंदी में पाठ आधारित वैज्ञानिक आलोचना का सूत्रपात किया। उनकी लिखी गई पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ से आज भी काल निर्धारण एवं पाठ्यक्रम निर्माण में मदद ली जाती है। उन्होंने ‘हिंदी शब्द सागर’ के साथ ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का संपादन भी किया। काशी विद्यापीठ के हिंदी विभाग के सेवानिवृत्त प्रोफेसर व साहित्यकार प्रो. श्रद्धानंद ने बताया कि हिंदी निबंध के क्षेत्र में रामचंद्र शुक्ल का महत्वपूर्ण योगदान है। आलोचना के साथ-साथ अन्वेषण और गवेषणा करने की प्रवृत्ति भी उनमें थी। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ उनकी इसी प्रवृत्ति का परिणाम है। निबंधों में उनकी अभिरुचि, विचारधारा अध्ययन आदि का पूरा समावेश है। वे लोकादर्श के पक्के समर्थक थे। इसकी छाप उनकी रचनाओं में सर्वत्र मिलती है। भाषा को अधिक सरल और व्यावहारिक बनाने के लिए उन्होंने तड़क-भड़क अटकल-पच्चू आदि ग्रामीण बोलचाल के शब्दों को भी अपनाया। नौ दिन चले अढ़ाई कोस, जिसकी लाठी उसकी भैंस, पेट फूलना, काटों पर चलना आदि कहावतों व मुहावरों का भी प्रयोग नि:संकोच होकर किया।
प्रो. श्रद्धानंद ने बताया कि वह हिंदी साहित्य के कीर्ति स्तंभ हैं। तुलसी, सूर और जायसी जैसी निष्पक्ष और मौलिक आलोचनाएं उन्होंने प्रस्तुत की, वैसी अब तक कोई नहीं कर सका है। उनकी ये आलोचनाएं हिंदी साहित्य की अनुपम निधियां हैं। वह हिंदी के प्रथम साहित्यिक इतिहास लेखक हैं, जिन्होंने कवि-वृत्त-संग्रह से आगे बढ़कर हिंदी जगत को बहुत कुछ दिया है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी आचार्य शुक्ल को हिंदी साहित्य के उन्नायकों में अति विशिष्ठ स्थान प्राप्त है। निबंधकार, समालोचक, संपादक, अनुवादक, कोषकार रूपों में हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। आचार्य शुक्ल को हिंदी के मनोवैज्ञानिक निबंध लेखन परंपरा का जनक माना जाता है। उन्होंने इतिहास लेखन की परंपरा की शुरुआत की। इस दृष्टि से उनका हिंदी-साहित्य का इतिहास आज भी विशिष्ट है।
बेहद आसान होती है अभिव्यक्ति
जो आनंद हिंदी में काम करने में आता है वह अन्य किसी भाषा में नहीं आता है। हम जो भी सोचते है, विचार करते हैं उसे मूलरूप से अपनी भाषा में ही कहते हैं। अगर हमें अपना मंतव्य किसी दूसरे के सामने दूसरी भाषा में रखना होता है तो हम उसे मूलरूप में न बताकर भाषा अनुवाद करते हैं। इससे हमारी मानसिक ऊर्जा खर्च होती है।
- डॉ. विंध्याचल यादव, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, बीएचयू
हिंदी के बगैर मुश्किल है भारत की तस्वीर
हिंदी में देश की आजादी की खुशियों का गान भी है तो बंटवारे एवं विस्थापन का दर्द भी है। इसलिए भारत की वास्तविक तस्वीर को समझना हिंदी के बिना मुश्किल है। सामान्य जनमानस की भाषा होने के कारण यह जीवन एवं उनकी चुनौतियों से बहुत गहरे स्तर पर जुड़ी है। इस भाषा के विकास में समाज के प्रत्येक वर्ग का योगदान है। हिंदी का सम्मान, देश की गरिमा, भावना एवं चेतना का सम्मान है।
- डॉ. नवरत्न सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, भाषा विभाग, काशी विद्यापीठ