वाराणसी। लगभग साढ़े पांच साल पहले मेट्रोपोलिटन सिटी घोषित बनारस की हालत कसबों से भी बदतर है। न तो सड़कें दुरुस्त हैं और न ही स्ट्रीट लाइट। साफ-सफाई की व्यवस्था भी ध्वस्त है। कूड़े के ढेरों से गुजरना शहरियों की नियति बन गई है। बिजली-पानी का संकट तो जैसे कभी खत्म ही नहीं होगा। अखिलेश यादव की सरकार बनने पर उम्मीद जगी थी कि शायद इस दिशा में अब कुछ पहल हो। क्योंकि, मुलायम सिंह के पिछले कार्यकाल में ही काशी मेट्रोपोलिटन सिटी घोषित हुई थी। लेकिन, अब तक मायूसी ही हाथ लगी है। उदासीनता का आलम यह है कि योजना नियामकों ने अब तक शहर क्षेत्र में भी उच्चस्तरीय सुविधाएं विकसित करने के बारे में विचार तक नहीं किया है।
पूर्व की मुलायम सरकार के कार्यकाल में 30 नवंबर 2006 को वाराणसी को मेट्रोपोलिटन सिटी घोषित किया गया था। इसमें वाराणसी नगर निगम, छावनी परिषद, नगर पालिका परिषद रामनगर व मुगलसराय को शामिल करने की बात कही गई थी। इसके अलावा वाराणसी व चंदौली जिले के पांच ब्लाकों काशी विद्यापीठ के 72, आराजीलाइन के आठ, हरहुआ के 37, चिरईगांव के 37 तथा नियमताबाद के 87 सहित कुल 195 गांवों को इसमें शामिल किया जाना था। मेट्रोपोलिटन सिटी में शामिल गांवों में मूलभूत सुविधाएं विकसित होना तो दूर, अब तक नगर निगम क्षेत्र में भी आबादी के अनुरूप पानी, बिजली, सड़क, सीवर, पार्क, चिकित्सा, शिक्षा, फायर ब्रिगेड, सुरक्षा व्यवस्था आदि से जुड़ी आवश्यक सुविधाएं भी विकसित नहीं हो पाई हैं। मेट्रोपोलिटन सिटी में शामिल काशी विद्यापीठ ब्लाक के ककरमत्ता, चांदपुर, महेशपुर, फुलवरिया, शिवदासपुर, हरपालपुर, मड़ौली, लखनपुर, चुरामनपुर, भुल्लनपुर, जलालीपट्टी, कंचनपुर, भिखारीपुर, चितईपुर, पहाड़ी, कंदवा, मड़ुवाडीह, लहरतारा, लोहता भट्ठी एवं महमूदपुर आदि गांवों में तो स्थिति और भी खराब है। इनमें से अधिकांश गांवों में सीवर लाइन व जल निकासी की व्यवस्था तक नहीं है।