वाराणसी। मुरादाबाद में पति के तीन साल से लापता रहने पर पत्नी को दोबारा निकाह का निर्देश दिए जाने के शरई अदालत के फैसले को काजी-ए-शहर और उलेमा ने सही करार दिया है। लेकिन इसमें दी गई मियाद पर अंगुली भी उठाई है।
मुरादाबाद की एक महिला ने शरई अदालत में अर्जी लगाई थी कि उसका शौहर पिछले साढ़े तीन साल से लापता है। अब वह उसके निकाह से आजाद होकर दूसरी शादी करना चाहती है। अदालत ने उसे 15 दिन का समय दिया कि वह अपने शौहर का पता लगा ले। इसके बाद ही शरई अदालत उसे शादी की इजाजत देगी। अदालत के इस फैसले का स्वागत नगर के उलेमाओं ने किया है। काजी-ए-शहर मुफ्ती गुलाम यासीन ने कहा कि शरई अदालत ने समय सीमा का निर्धारण ठीक नहीं किया। औरत द्वारा अपने शौहर के लापता होने की अर्जी दिए जाने के समय से चार साल तक इंतजार करने की बात होनी चाहिए थी। उसके बाद शरई अदालत उसके निकाह को वापस लिए जाने पर फैसला देती। इद्दत के चार माह दस दिन पूरे कर महिला शरीयत के हिसाब से पहले निकाह से अलग होकर दूसरा निकाह कर सकती। अदालत का 15 दिन का समय देना शरीयत के हिसाब से सही नहीं है। यही बात मुफ्ती हारुन रशीद नक्शबंदी ने भी कही। बताया कि समय सीमा में विरोधाभास दिख रहा है। हालांकि दोनों उलेमाओं ने शरई अदालत के फैसले को मुसलिम महिलाओं के हक में बताया। कहा कि इससे उन महिलाओं को भी फायदा होगा जो लगभग ऐसी ही परिस्थितियों में जीवनयापन कर रही हैं।