वाराणसी। जाने-माने ठुमरी गायक पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र ने शनिवार को पूरब अंग की गायिकी को लेकर गहरी चिंता जताई। उनकी मानें तो अब ठुमरी गाने वाले कम हो गए हैं। ऐेसे में बनारस घराने की गायिकी की इस विधा को सीखने-सिखाने का दौर मंद पड़ गया है। पूर्वांचल के विश्वविद्यालयों बीएचयू और काशी विद्यापीठ में ठुमरी की कक्षाएं शुरू नहीं की गईं तो आने वाले दिनों में संकट पैदा हो जाएगा। उन्होंने अपनी पीड़ा शनिवार को रथयात्रा स्थित कन्हैयालाल गुप्त स्मृति भवन में बयां की। वे संगीत सेवा के लिए जबलपुर स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से डीलिट् की मानद उपाधि से नवाजे जाने के बाद पत्रकारों से मुखातिब थे।
डीलिट् की उपाधि पाने वाले वह बनारस घराने के पहले उपशास्त्रीय गायक हैं। इससे पहले पद्मभूषण गिरिजा देवी को पीएचडी की मानद उपाधि मिल चुकी है। बेहद भावुक अंदाज में पं. छन्नूलाल ने इसे बनारस के संगीत का सम्मान बताया। बताया कि कुछ लोग दिल्ली, मुंबई में फ्लैट देकर उन्हें बसने का आमंत्रण दे चुके हैं। एक बार अमेरिका की यात्रा पर गया था। वहां न मन पसंद खाना मिला न ही नींद आ सकी। इसलिए जल्दी लौट आया। दोबारा वहां से सात कार्यक्रम करने के लिए बुलावा आया, लेकिन मना कर दिया। कहा कि बनारस जैसा भोजन, लोगों का स्वभाव और गंगा का तट दुनिया में कहीं नहीं मिल सकता। इसलिए काशी नहीं छोड़ सकता। बनारस का संगीत डूबने न पाए, इसकी चिंता लगी रहती है। पूरब अंग की गायिकी की कक्षाएं चलाने का आग्रह लेकर बीएचयू के कुलपति से मिल चुका हूं।