बड़ागांव। क्षेत्र के सरावां गांव स्थित मां भद्रकाली का मंदिर विभिन्न किंवदंतियों को अपने में समेटे आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। ऐसी मान्यता है कि यह गांव मां भद्रकाली और राजा भद्रसेन की शक्ति और भक्ति के लिए प्रसिद्ध था। उज्जैन के राजा विक्रमादित्य को ब्रह्महत्या के श्राप से मुक्ति के लिए अमृत कलश लेने नौकर के वेष में यहां आना पड़ा था। इस मंदिर पर प्रत्येक शनिवार को भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। नवरात्र में भक्तों की ज्यादा भीड़ होती है।
ऐसी मान्यता है कि भद्रकाली अपने यहां आने वाले सभी भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती हैं। मंदिर के समीप ही वरुणा और बसुही नदी के संगम पर राजा भद्रसेन का किला था। किले के खंडहर आज भी एक टीले के रूप में मौजूद हैं। यहां गुप्तकाल के आलीशान महलों के प्रमाण भी मिले हैं। मंदिर के प्रबंधक कल्पनाथ मिश्र बताते हैं कि राजा विक्रमादित्य को ब्रह्महत्या का श्राप लगा था। श्राप से मुक्ति के लिए राजपुरोहित ने उन्हें सरावां गांव के पास राजा भद्रसेन की आराध्य देवी भद्रकाली की पूजा कर अमृत लाने के लिए कहा। विक्रमादित्य राजा भद्रसेन के यहां नौकरी करने लगे। राजा भद्रसेन की पूजा करते देख विक्रमादित्य ने भी मां की पूजा की और अमृत कलश प्राप्त किया। तभी से मान्यता है कि प्रत्येक शनिवार को मां भद्रकाली यहां आती हैं। पूर्व ब्लाक प्रमुख प्रसिद्ध नारायण सिंह, सत्येंद्र कुमार, श्याम नारायण, बीरबल मिश्र, संजय पांडेय आदि ग्रामीणों का कहना है कि नवरात्रि में भारी भीड़ जमा होने के बावजूद प्रशासन की ओर से सुरक्षा का खास इंतजाम नहीं किया गया है। मंदिर परिसर में भगदड़ की स्थिति बनी रहती है। उन्होंने प्रशासन से पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था करने की मांग की।