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किस बात की जल्दी, किसका था दबाव

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वाराणसी। वरुणा कॉरिडोर मामले में मुख्य अभियंता (सोन), अधीक्षण अभियंता और अधिशासी अभियंता के विरुद्ध कार्रवाई में जल्दबाजी से बड़े ओहदेदारों की भूमिका पर सवाल उठ गए हैं। ऐसा क्या दबाव था कि गहराई से मामले की पड़ताल कराने तक की जरूरत नहीं समझी गई। जबकि, 21 करोड़ रुपये की मिट्टी के भुगतान की जो फाइल इस पूरे मामले की तह में है, उस पर नियमानुसार प्रक्रिया अपनाई जा रही थी। सत्यापन इसलिए भी जरूरी था कि प्रति किलोमीटर के हिसाब से एक करोड़ रुपये से अधिक की मिट्टी दिखाई गई थी। बिना सत्यापन रिपोर्ट आए इतनी बड़ी रकम के भुगतान के लिए जल्दबाजी आखिर क्यों की जा रही थी। जबकि, यह पूरा मामला मंत्री और प्रमुख सचिव (सिंचाई) तक पहुंच चुका था।
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अस्तित्व से जूझ रही वरुणा के संरक्षण के साथ ही इसे पर्यटन और आम नागरिकों की सुविधाओं के लिहाज से विकसित करने के लिए वरुणा कॉरिडोर की योजना बनाई गई। करीब डेढ़ साल पहले पूर्ववर्ती सपा सरकार ने इसका काम शुरू कराया। कार्यदायी संस्थाओं के दावे को सही मानें तो अब तक 56 प्रतिशत काम कराया जा चुका है जबकि 44 प्रतिशत काम बाकी है। 201 करोड़ रुपये योजना की कुल लागत है। इसमें 75 करोड़ रुपये को छोड़ बाकी रकम भी शासन से मिल चुकी है। सूत्रों का दावा है कि पिछली सरकार में बजट खपाने की जल्दबाजी में जैसे-तैसे काम शुरू करा दिया गया। जबकि, शुरुआत नदी के दोनों किनारों पर पहले अवैध निर्माण गिराने और ग्रीन बेल्ट संरक्षित करने से की जानी चाहिए थी। इसके बाद नदी में सीवेज का गिरना रोका जाना चाहिए था लेकिन यह भी नहीं हुआ। मनमानी की यह जो शुरुआत हुई, इस पर मुख्यमंत्री के सख्त रुख के बावजूद नई सरकार में भी जिम्मेदारों ने ध्यान नहीं दिया। विभागीय सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि जैसे-तैसे बजट खपाकर काम को शत प्रतिशत दिखाने की जो जल्दबाजी पूर्ववर्ती सरकार में थी, वह मुख्यमंत्री के कड़े रुख के बावजूद अब भी खत्म नहीं हो पाई है। नीचे से ऊपर तक पुरानी प्रक्रियाएं ही अपनाई जा रही हैं। मिट्टी के भुगतान की फाइल पर अंदरखाने मची रार भी उसी कड़ी का हिस्सा है।
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