वाराणसी। असि नदी का तो बस नाम ही रह गया है। यह अब नाले में तब्दील हो चुकी है। महामना मालवीय गंगा शोध केंद्र के तहत चलाए जा रहे ईको स्किल्ड गंगामित्र प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत गंगा मित्रों ने साकेत नगर से लेकर असि-गंगा संगम तक तकनीकी सर्वेक्षण किया। असि में गिरने वाले नालों के बारे में भी जानकारी ली।
शोध केंद्र के चेयरमैन व पर्यावरण विज्ञानी प्रो. बी.डी. त्रिपाठी के निर्देशन में गंगा मित्रों ने असि को पुनर्जीवित करने के लिए कार्ययोजना पर विचार विमर्श किया। गुरुवार को तकनीकी सर्वेक्षण के दौरान प्रदेश सरकार के पूर्व चीफ इंजीनियर रमेश कुमार सिंह ने गंगामित्रों को तकनीकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि असि नदी के पुनरोद्धार के लिए शार्ट टर्म और लांग टर्म योजना बनानी होगी। शार्ट टर्म योजना के तहत असि के वर्तमान उद्गम स्थल कंदवा तालाब से गंगा असि संगम क्षेत्र तक ड्रोन कैमरे की मदद से वर्तमान भौतिक अस्तित्व, अतिक्रमण बिंदुओं और प्रदूषण के स्त्रोतों को दर्शाने वाला नदी का नक्शा तैयार करना होगा। साथ ही असि नदी के जलग्रहण क्षेत्र में मौजूदा वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्जिंग संरचनाओं के लिए योजना तैयार करनी होगी। इसके साथ ही युवाओं और महिलाओं को जागरूक करना होगा। तकनीकी टीम में रवींद्र सहाय और सी शेखर भी थे।
पुराणों में काशी क्षेत्र के उत्तर में वरुणा, पूर्व में गंगा और दक्षिण में असि नदी का उल्लेख है। प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर ये तीनों नदियां प्राकृतिक रूप से काशी नगरी को स्थिरता प्रदान करती हैं। गंगा के दक्षिणी मोड़ पर मिलने वाली असि नदी को अब नदी मानने में कठिनाई होती है। वजह, इसका वजूद आज अस्सी नाला के रूप में ही शेष रह गया है। गंगा-वरुणा के सतह से काफी ऊंचाई पर बहने वाली इस नदी का गंगा में प्राकृतिक संगमीय कोण 45 से 60 डिग्री हुआ करता था। वर्तमान में अप्राकृतिक रूप से इसे स्थानांतरित कर दक्षिणी छोर पर ही तकरीबन 90 डिग्री कोण से गंगा में मिलाया गया है और इसमें नदी के एक भी चारित्रिक गुण नहीं हैं।