वाराणसी। सनातन धर्म रत्नों की अनमोल गठरी के समान है जिसे सहेज कर रखना अत्यन्त आवश्यक है। पाश्चात्य संस्कृति वाले देश वेदों का अनुवाद कर रहे हैं लेकिन सिर्फ अपने लाभ के लिए और उससे वेदों का अनर्गल अर्थ निकाला जा रहा है। यदि वे वाकई सनातन धर्म के स्थापित मान बिन्दुओं को जानना और समझना चाहते हैं तो वे करपात्री जी के वेदान्त पारिजात का अध्ययन करें। उक्त बातें शनिवार को दुर्गाकुण्ड स्थित धर्मसंघ शिक्षा मण्डल के प्रांगण में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री डा. महेन्द्र नाथ पांडेय ने कहीं।
धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के 110 वें प्राकट्योत्सव पर चल रहे विविध आयोजन के तहत आयोजित तीन दिवसीय क्षेत्रीय वैदिक सम्मेलन के समापन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए डा. पांडेय ने कहा कि करपात्री जी ने सनातन धर्म की अत्यन्त ही विस्तृत व्याख्या की है। सम्मेलन में धर्मसंघ पीठाधीश्वर शंकरदेव चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज ने कहा कि करपात्री जी का सम्पूर्ण जीवन धर्म की रक्षा में ही व्यतीत हुआ। अध्यक्षता कर रहे प्रो. हृदय रंजन शर्मा ने कहा कि भारतीय संस्कृति ही एकमात्र ऐसी संस्कृति है जिसने काल गणना का ज्ञान पूरे विश्व को दिया। प्रो. रामराज्य उपाध्याय ने कहा कि करपात्री जी ने जिन उद्देश्यों को दृष्टिगत रखते हुए रामराज्य की परिकल्पना की थी उसको साकार करने का समय आ गया है। सम्मेलन में प्रो. पंतजलि मिश्र, प्रो. महेन्द्र पाण्डेय, गगन कुमार चट्टोपाध्याय, मनोज मिश्रा, डा. उपेन्द्र त्रिपाठी, डा. विकास दीक्षित, डा. सुनील कात्यायन आदि विद्वतजनों ने भी विचार व्यक्त किए। पौराणिक मंगलाचरण पं. रत्नाकर मिश्रा ने किया। स्वागत सत्य कुमार तिवारी, धन्यवाद ज्ञापन पं. जगजीतन पांडेय ने किया। सम्मेलन में दुर्गेश पाठक, रमेश शुक्ल, विपिन झा, आनन्द तिवारी, राकेश भट्ट, श्याम सुन्दर तिवारी, चन्दन, अनन्तेश्वर मिश्र, श्रीनिवास पुराणिक, मोहन दूबे आदि ने सहयोग किया।