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देश में फिर काशी के रंगमंच का डंका ं

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वाराणसी। काशी की संगीत परंपरा के साथ ही यहां का रंगमच भी विख्यात है। इसके चलते ही इस शहर को सांस्कृतिक राजधानी का दर्जा मिला है। आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय से नाटकों के लिखने और उनके मंचन का दौर शुरू हुआ। बीच में कुछ ठहराव के बाद आज यहां के रंगकर्मी फिल्मी दुनिया के साथ ही पूरे देश में अपनी प्रतिभा का डंका बजा रहे हैं।
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भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने (1850 से 1885) अल्प आयु में ही आधुनिक हिंदी को मजबूत रास्ता दे दिया। उन्होंने नाटक लिखे, संस्थाएं बनाईं और नाटकों का मंचन हुआ। उन्होंने अपने लेखनी से लोगों को आगे बढ़ाया। काशी में नागरिक प्रचारिणी के बाद 1909 में नागरी नाटक मंडली बना, जहां आज भी नाटकों का मंचन होता है। इन संस्थाओं से बहुतेरे लोग निकले और कई प्रमुख जगहों पर अभिनय किए। इसी बीच 1948 के बाद सांस्कृतिक का केन्द्र काशी की जगह दिल्ली बन गया और बनारस हाशिए पर आ गया। बावजूद इसके यहां के कलाकारों ने अपना काम शुरू रखा। धीरे-धीरे इसकी गूंज दिल्ली सहित पूरे देख में सुनाई देनी चाहिए। यहां के कुछ युवा रंगकर्मियों ने वर्ष 2010 में 15 लोगों की टीम बनाई और काम को आगे बढ़ाना शुरू किया। स्थिति यह है कि पिछले नौ सालों में ही यहां रंगमंच की कला फिर से पूरे देश में अपनी छाप छोड़ने लगी।
रंगमंच से जुड़े लोग
हम लोगाें ने मेहनत के बल पर युवाओं के लिए अवसर पैदा किए। उनके लिए रास्ते बनाए। जो लोग कहते हैं कि नाट्य मंचन में पैसा नहीं है, वह आलसी और हारे हुए लोगों की कल्पना है। मैंने काशी के अलावा कई स्थानों पर जाकर यहां की कला का लोहा मनवाया है। - व्योमेश शुक्ला
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राम की शक्ति पूजा ने किया स्थापित
वैसे तो काशी में रंगमंच के कलाकारों में स्व. लीला मिश्रा थे, जिन्होंने मदर इंडिया जैसी सुपर हिट फिल्मों में काम किया। नाटकों की बात की जाए तो राम की शक्ति पूजा ने भी पूरे देश में काशी की कला को स्थापित किया है। यहां का मैकवेथ, अभिज्ञान शाकुंतलम और हरिश्चंद्र नाटक का मंचन भी चर्चित रहा। नागरी नाटक मंडली की अगर बात की जाए तो यह भी 110 साल पुरानी संस्था हो चुकी है, जहां देश सहित विदेशी कलाकारों ने अपना मंचन किया है।
भारतीय शास्त्रीय नाट्य परंपरा का पहला केन्द्र है
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का काशी में खुला केंद्र केवल प्रदेश का नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर भारत का पहला केंद्र है। यह विश्व का पहला ऐसा केंद्र है, जो भारतीय शास्त्रीय नाट्य परंपरा पर आधारित है, जहां कई प्रदेशों के 20 छात्र प्रशिक्षण ले रहे हैं। इस केंद्र के सहयोग से देश के ही नहीं बल्कि अन्य देशों के कलाकार भी अपना मंचन कर चुके हैं। -रामजी बाली, संचालक एनएसडी वाराणसी।
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