रामनगर। माता सीता पसोपेश में बैठी हैं तभी प्रभु श्रीराम आते हैं और कहते हैं कि यह समय सोचने का नहीं है। शीघ्र वन चलने की तैयारी करो।
रामनगर की श्रीरामलीला में नौवें दिन मंगलवार को वन गमन, निषाद मिलन आदि का मंचन किया गया। अयोध्या कांड के 57 से 98 तक के दोहों की लीला के दौरान कई ऐसे मोड़ आए श्रद्धालु अपने आप को रोने से रोक नहीं सके।
सीता जी अपनी सास का पैर पकड़ कर कहती हैं कि मैं बहुत अभागिन हूं। जब सेवा करने का समय आया तो वन जा रही हूं। इस बीच लक्ष्मण आते हैं और वह भी वन जाने के लिए जिद करते हैं। राजा दशरथ सीता को समझाते हैं कि तुम वन मत जाओ तुम्हें बहुत कष्ट होगा। सीता संकोचवश कोई उत्तर नहीं देती हैं। इतने में कैकेयी तिलमिला कर आती हैं और राम के आगे मुनियों का वस्त्र रख देती हैं।
यह सब देख दशरथ के मुख से निकला कि अभागा प्राण भी नहीं निकलता। इतना कह कर वह अचेत हो जाते हैं। श्रीराम मुनि वेष में राजमहल से निकल पड़ते हैं। और सबको समझाते हैं कि सब लोग महाराज की सेवा करें हम शीघ्र वापस आएंगे।
माता-पिता को शीश नवाकर राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण को साथ लेकर वन के लिए चल पड़े। गुरु वशिष्ठ को उन्होंने अयोध्या की देखरेख माता-पिता की तरह करने के लिए कहा। राम के जाते ही अयोध्या के लोग शोक में डूब जाते हैं।
उधर, राम को वन के लिए प्रस्थान करते ही लंका में रावण को बुरा सपना दिखाई देने लगा। यह देखकर देवता प्रसन्न होते हैं। अयोध्या में होश में आने पर दशरथ सुमंत से पूछते हैं कि राम वन को चले गए। प्राण शरीर से नहीं जाता, किस सुख के लिए भटक रहा है। वह सुमंत को रथ लेकर राम को बुलाने के लिए भेजते हैं। उधर, रास्ते में निषाद राज समाचार पाकर कंदमूल फल लेकर राम के दर्शन के लिए दौड़ पड़ते हैं। राम से मिलने के बाद वह उन्हें अपने गाँव ले जाना चाहते हैं लेकिन राम वन में ही रहने को कहते हैं। निषाद राज सभी को भोजन कराते हैं। भोजन के बाद राम-सीता भूमि पर शयन करते हैं, यह देखकर निषाद राज रोने लगते हैं तो लक्ष्मण ने उन्हें समझाते हैं कि मोह छोड़कर सीता-राम के चरण कमल में अनुराग करें। यहीं पर भगवान की आरती के बाद लीला विश्राम ले लेती है।
..और रो पड़ते हैं श्रद्धालु
आज की लाला में श्रद्धालु प्रभु श्रीराम, माता सीता और भाई लक्ष्मण को वनवासी के वेष में देख कर रो पड़ते हैं। प्रभु को वन जाते ही पूरी अयोध्या सूनी हो जाती है। न कहीं चूल्हा जलता है और नही कहीं दीया बाती जलती है। शोकाकुल अयोध्या के लोग कहीं राजा को कोसते हैं तो कहीं अयोध्या के भाग्य को।