वाराणसी। आभिजात्य दबाव के कारण सामूहिक चुप्पियां भारतीय लोकतंत्र की नींव को कमजोर करती हैं। मुक्तिबोध ऐसे कवि हैं जिन्होंने लगातार मध्यवर्गीय चुप्पियों पर निशाना साधा है। मुक्तिबोध जितना अपनी कविताओं के कारण जीवित हैं उतना वैचारिक लेखन से नहीं। उक्त विचार विख्यात विचारक, समाज विज्ञानी और राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अभय दुबे ने व्यक्त किए। वह बुधवार को प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से काशी हिंदू विश्वविद्यालय के एनी बेसेंट सभागार में आयोजित मुक्तिबोध की वैचारिकी विषयक संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने भक्तिकाल पर लिखे उनके लेख भक्ति आंदोलन का एक पहलू पर सवालिया निशान भी लगाए और कहा कि इस एक लेख ने हिंदी साहित्य जगत की धारा मोड़ने में बड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने भक्तिकालीन हिंदी आलोचना के माध्यम से इतिहास लेखन की समस्याओं और मार्क्सवादी आलोचनाओं की खेमेबंदियों पर भी विचार रखे। विमर्शों के सामान्यीकरण और त्वरित प्रतिक्रिया पर कहा कि इस सरलीकरण की प्रक्रिया से हम आलोचना की पुरानी जमीन खो देंगे। इस अवसर पर प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. बलिराज पांडेय, प्रो. आशीष त्रिपाठी, प्रो. अर्चना कुमार, डॉ. वंदना चौबे, डॉ. प्रभाकर सिंह, डॉ. नीरज खरे, डॉ. ओमप्रकाश, डॉ. डीके ओझा, प्रो. आनंद दीपायन, डॉ. सत्यपाल शर्मा, डॉ. सुमन जैन, डॉ. आभा गुप्ता ठाकुर आदि मौजूद रहे।