हिंदी का गढ़ कहे जाने वाले नागरी प्रचारिणी सभा में संरक्षित 19वीं शताब्दी का ज्ञान जल्द ही देश और विदेश की ज्ञान पिपासु जनता को भी उपलब्ध होगा। केंद्र और प्रदेश सरकार की पहल पर नागरी के 17 हजार हस्तलेखों को अब तक डिजिटल स्वरूप में ढाला जा चुका है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के प्रयास से सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस कंप्यूटिंग (सीडेस्को) ने इसका डाटा तैयार कर लिया है। सभा के अपर सचिव सभाजीत शुक्ला ने बताया कि उन्होंने राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के निदेशक को 17 हजार हस्तलेखों के संरक्षित किए जाने की जानकारी पत्र द्वारा उपलब्ध करा दी है। संभावना है कि जल्द ही यह दुर्लभ हस्तलेख पूरी दुनिया के लिए आभासी मंच पर भी उपलब्ध होंगे।
सीडेस्को ने नागरी प्रचारिणी सभा की 19वीं शताब्दी से लेकर 1950 तक उपलब्ध दुर्लभ पांडुलिपियों, पुरानी पत्रिकाओं, दुर्लभ हिंदी पुस्तकों का डिजिटल आर्काइव तैयार किया है। इस आर्काइव में 35 लाख पृष्ठों को शामिल किया गया है। सीडेस्को को इस कार्य के लिए सरकार की तरफ से 93 लाख का अनुदान दिया गया था।
19 विषय हैं शामिल
दुर्लभ हस्तग्रंथों में 19 विषयों को शामिल किया गया है। इसमें अध्यात्म, दर्शन, योग, आयुर्वेद, इतिहास, कर्मकांड, कामशास्त्र, गणित, गीता, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, धर्म, नीति, भूगोल, शकुन, शालिहोत्र, सामुद्रिकशास्त्र, साहित्य, स्तोत्र, स्वरोदय विषयों के हस्तलेख हैं।
मिले कुछ अपूर्ण हस्तलिखित ग्रंथ
अध्यात्मलीलावती हस्तलिखित ग्रंथ की रचना संतनकवि ने की है। 14 पृष्ठों की यह रचना अपूर्ण है। इसको प्राचीन ग्रंथ की श्रेणी में रखा गया है। इसी तरह तौल पैमाना ग्रंथ के लेखक अज्ञात हैं और यह ग्रंथ भी अपूर्ण ही है। इसमें 34 पृष्ठ हैं। ऐसे ही हस्तग्रंथों की पूरी जानकारियाें की सूची नागरी नाटक मंडली में उपलब्ध हैं। इसको कोई भी आसानी से लेकर देख सकता है।
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नष्ट होते हस्तलिखित ग्रंथों की हुई थी खोज
नागरी प्रचारिणी सभा ने स्थापना के साथ ही प्राचीन विद्वानों के हस्तलेख नगरों और देहातों में से एकत्र कराना शुरू किया। 1900 से सभा ने अन्वेषकों को गांव-गांव और नगर-नगर में घर-घर भेजकर इस बात का पता लगाना आरंभ किया कि किसके यहां कौन-कौन से ग्रंथ उपलब्ध है। उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी यह कार्य हुआ। इस खोज की त्रिवार्षिक रिपोर्ट भी सभा प्रकाशित करती है। हस्तलिखित ग्रंथों की खोज का संक्षिप्त विवरण भी चार भागों में सभा ने प्रकाशित किया है। परिणामस्वरूप ही हिंदी साहित्य का व्यवस्थित इतिहास तैयार हो सका और अनेक अज्ञात व ज्ञात लेखकों की अनेक अज्ञात कृतियां प्रकाश में आई हैं।
नौवीं के छात्रों ने की थी स्थापना
हिंदी को सम्मान दिलाने और प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से नौवीं के छात्र रहे बाबू श्यामसुंदर दास, पं. रामनारायण मिश्र व शिवकुमार सिंह ने 1893 में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की। आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र के फु फेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास को अध्यक्ष बनाया गया।
हिंदी की प्राचीनतम शोध पत्रिका है नागरी प्रचारिणी पत्रिका
हिंदी की सबसे प्राचीन शोध पत्रिका है नागरी प्रचारिणी। यह 1897 से निकल रही है। इस पत्रिका के संपादक मंडल में बाबू श्याम सुंदर दास, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, जयचंद विद्यालंकार, डॉॅ. संपूर्णानंद, आचार्य नरेंद्र देव, हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वान रहे।
आर्य भाषा पुस्तकालय भी है यहां
सभा में आर्यभाषा पुस्तकालय में हजारों पत्र-पत्रिकाओं की फ ाइलें, 50 हजार हस्तलेख और हिंदी के अनुपलब्ध ग्रंथों का संग्रह है। डॉ. श्याम सुंदर दास, पं. रामनारायण मिश्र अज्ञेय के पिता हीरानंद शास्त्री, मायाशंकर याज्ञिक, डॉ. संपूर्णानंद, नंद दुलारे वाजपेयी, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, कृष्णदेव प्रसाद गौड़ बेढब बनारसी, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसमें प्रमुख रूप से अवदान किया। उन्होंने अपना पुस्तकालय इसे समर्पित कर दिया।
हिंदी का शब्दकोष दिया
20वीं सदी के प्रारंभ में सभा ने हिंदी के शब्दकोष को तैयार करने का बीड़ा उठाया। 1904 में यह कार्य शुरू हुआ और 25 सालों के अथक प्रयास से इसे पूर्ण किया गया। इसके संपादक थे बाबू श्याम सुंदर दास और सहायक संपादक मंडल में थे बाल कृष्ण भट्ट, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, अमीर सिंह, जगमोहन वर्मा, लाला भगवानदीन और रामचंद्र वर्मा।